Kabirdham poor man struggle: अपनी कहानी सुनाते-सुनाते वो शख्स कई बार रो पड़ा. उनके शब्द दिल को हिला देते हैं- “अब मैं थक चुका हूँ… पत्नी का दर्द देखा नहीं जाता. भगवान चाहे तो मौत दे दे, या फिर सरकार उसकी मदद कर दे ताकि मैं उसे ठीक कर सकूं… बस यही उम्मीद है.” ये कहानी है एक बेबस पति की...दरअसल उसका संघर्ष और अपनी पत्नी के प्रति अटूट प्रेम—सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसमें गरीब आदमी बीमारी से नहीं, बल्कि इलाज के खर्च से लड़ते-लड़ते हार जाता है.
थायरॉयड कैंसर से जूझ रही है पत्नी
हम बात कर रहे हैं कवर्धा ज़िले के नगवाही कांटाबाहरा रेंगाखार निवासी समलू मरकाम की. उनकी ज़िंदगी संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी है. उनकी पत्नी कपुरा मरकाम (57)पिछले तीन साल से थायरॉयड कैंसर से जूझ रही हैं. इलाज की तमाम कोशिशों,लाखों रुपये खर्च होने और घर-जमीन बिक जाने के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हो पाया.

Kabirdham thyroid cancer: कवर्धा ज़िले के समलू मरकाम ने थायरॉयड कैंसर से जूझ रही पत्नी के इलाज के लिए सबकुछ कुर्बान कर दिया
दोनों पैर सुन हो चुके हैं,चलना तो दूर खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है. लेकिन पति समलू आज भी उम्मीद का दिया जलाए हुए हैं. शादी के सात फेरों के समय जो साथ निभाने का वचन लिया था,उसे वह हर दिन निभा रहे हैं तप,त्याग और प्रेम के सबसे कठिन इम्तिहान पर खरे उतरते हुए.
अपनी मोटरसाइकिल को ही बना दिया एंबुलेंस
समलू ने मजबूरी में अपनी मोटरसाइकिल को ही एंबुलेस जैसा बना लिया. पहले बाइक के पिछले हिस्से पर पटरी लगाई फिर उस पर गद्दे रखे. फिर जब भी पत्नी को अस्पताल ले जाना होता तो उसी पर लेटा कर उन्हें पत्नी को कपड़े की रस्सी से बांध देते हैं..ताकि वो गिरें न. इसी तरह से वे एक शहर से दूसरे शहर या एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल पत्नी को इलाज के लिए लेकर जाते हैं.
घर-जमीन भी बेची… पर हिम्मत नहीं टूटी
NDTV से बातचीत में समलू मरकाम ने भारी मन से अपने दर्द की कहानी सुनाई. उन्होंने बताया- तीन साल पहले पत्नी को थाइरॉयड कैंसर का पता चला. छत्तीसगढ़ के कई बड़े अस्पतालों में इलाज करवाया. दूसरे राज्यों में भी ले गए, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां तक अपनाईं. लगभग 5 लाख रुपये खर्च हो गए. इलाज के लिए घर-जमीन तक बेचनी पड़ी. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद बीमारी ठीक नहीं हुई.

कवर्धा ज़िले के समलू मरकाम घर पर खुद ही करते हैं पत्नी की देखभाल. उनकी पत्नी अब चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं.
एम्स में भर्ती पर पैसे नहीं हैं
समलू आर्थिक रूप से कमजोर है अब उनके पास रुपये खत्म हो चुके हैं, पर हिम्मत अब भी खत्म नहीं हुई. वे बताते हैं कि पैसे है नहीं इस वजह से दो साल से ज्यादा समय से परेशान हूं. पत्नी को मोटरसाइकिल में लेटाकर इलाज के लिए दर-दर भटकता हूं. मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, अधिकारियों से कई बार आर्थिक मदद की मांग की, लेकिन अब तक कोई सहयोग नहीं मिला. वर्तमान में वह रायपुर एम्स में पत्नी का इलाज करा रहे हैं. एक हफ्ते से भर्ती हैं, लेकिन उनके लिए खून-पेशाब जैसी नियमित जांचों का खर्च वहन करना भी मुश्किल हो रहा है. समलू रायपुर सदन में रहकर लोगों से मदद मांगते हुए इलाज जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं. समलू को अब सिर्फ इतना चाहिए कि सरकार उनके इलाज में आर्थिक सहयोग दे दे, ताकि उनकी पत्नी एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ी हो सके—और वह उसके दर्द की दवा बन सकें.
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