Sarangarh-Bilaigarh Collector Dr. Sanjay Kannauje: सरकारी स्कूल की साधारण कक्षा से निकलकर जिले का कलेक्टर (Collector) बनने तक का सफर आसान नहीं होता. यह सफर संघर्ष, अनुशासन और अटूट संकल्प की मांग करता है... सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले में पदस्थ कलेक्टर डॉ. संजय कन्नौजे (Dr. Sanjay Kannauje) की कहानी ऐसे ही युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं. नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा, बिलासपुर, बलौदा बाजार से सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले तक... जहां भी जिम्मेदारी मिली वहां डॉ. संजय कन्नौजे ने ईमानदारी की नई मिसाल पेश की. शरणार्थियों के पुनर्वास से लेकर विकास कार्यों तक... हर चुनौती को उन्होंने अवसर में बदला.
आसान नहीं था कलेक्टर तक सफर तय करना
डॉ. संजय कन्नौजे के लिए कलेक्टर तक सफर तय करना आसान नहीं था. गांव से निकलकर छत्तीसगढ़ पीसीएस का सपना देखना और फिर पहली पोस्टिंग दंतेवाड़ा जैसे जिले में मिलना... उस समय ये जिला नक्सल मामले में अपने चरम पर था. सीमित संसाधन, सुरक्षा चुनौतियां और प्रशासनिक दबाव... इन सबके बावजूद उन्होंने सेक्टर प्रभारी के रूप में पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाई.

सरकारी स्कूल से की पढ़ाई
कलेक्टर डॉ. संजय कन्नौजे का जन्म 27 नवम्बर 1979 को गरियाबंद में हुआ. अपनी प्रारंभिक शिक्षा गरियाबंद के ही सरकारी स्कूल से हासिल की. वहीं 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल से की. इसके बाद रायपुर के साइंस कॉलेज से गणित विषय में बीएससी की पढ़ाई की.
पहले प्रयास में बने डिप्टी कलेक्टर
संजय कन्नौजे अपने सपने को लेकर... और लक्ष्य को साकार करने के लिए 2002 में बिलासपुर पहुंचे, जहां उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) की तैयारी शुरू की. इस दौरान वो नियमित 6 से 7 घंटे पढ़ाई की. हालांकि वो 1 से डेढ़ घंटे का ग्रुप डिस्कशन करते थे. वहीं तनाव से दूर रहने के लिए दोस्तों के साथ थोड़ा मनोरंजन भी कर लिया करते थे. यही उनकी दिनचर्या थी... इस संतुलन का ही नतीजा रहा कि उन्होंने पहले ही प्रयास में PSC परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और डिप्टी कलेक्टर के रूप में चयनित हुए.

यहां हुई थी कलेक्टर संजय कन्नौजे की पहली पोस्टिंग
दरअसल, छत्तीसगढ़ का पहला PSC वर्ष 2003 में हुआ था, जिसका परिणाम 2005 में आया. इस सूची में डॉ. कन्नौजे का नाम भी शामिल था... संजय कन्नौजे छत्तीगसढ़ पीसीएस 2003 परीक्षा में सफलता हासिल कर अपने सपने को साकार किया... हालांकि इसके बाद आगे का रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि सफलता हासिल करने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में हुई, जहां सलवा जुडूम जैसे संवेदनशील हालात थे.
इन जिलों में दे चुके हैं अपनी सेवाएं
सीमित संसाधन, सुरक्षा चुनौतियां और प्रशासनिक दबाव... इन सबके बावजूद उन्होंने सेक्टर प्रभारी के रूप में पूरी ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई. दंतेवाड़ा के बाद उन्हें बीजापुर, बिलासपुर, बलौदा बाजार, रायपुर, कांकेर, कोंडागांव और बालोद जैसे जिलों की कमान सौंपी गई.

शरणार्थियों के पुनर्वास से विकास कार्यों तक... हर चुनौतियों को अवसर में बदला
बता दें कि बीजापुर–दंतेवाड़ा क्षेत्र में पुल-पुलियों और सड़कों की कमी, इंद्रावती नदी पर पुल न होना और नक्सली भय... इन सभी चुनौतियों को उन्होंने अवसरों में बदल दिया. उन्होंने जन समस्या निवारण शिविरों के माध्यम से योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया, जिससे शासन-प्रशासन के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत हुआ.
गांव से नेशनल अवॉर्ड तक तय किया सफर
कोंडागांव में जिला पंचायत सीईओ के रूप में कार्यकाल उनके लिए विशेष उपलब्धियों भरा रहा... जब वो जिला पंचायत सीईओ थे उसी समय कोंडागांव में इंदिरा आवास योजना की शुरुआत हुई थी. उस समय जिले में केवल दो आवास बने हुए थे... यहां से संजय कन्नौजे ने कोंडागांव को प्रदेश में प्रथम स्थान बनाया. इसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया. इसके अलावा वो अपनी पदस्थापना के दौरान बस्तर संभाग में ओडीएफ प्लस के लिए दूसरा स्थान और कांकेर में स्व-सहायता समूहों का उत्कृष्ट कार्य कराकर उपलब्धियां हासिल की... ये सभी उनकी प्रशासनिक क्षमता के उदाहरण हैं.
कलेक्टर ने युवाओं को दिए ये खास संदेश
डॉ. संजय कन्नौजे युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए. सही फील्ड चुनकर, मजबूत बेसिक शिक्षा, गाइडेंस और निरंतर मेहनत से सफलता जरूर मिलती है... असफलता से घबराने के बजाय अपनी कमियों को पहचानकर आगे बढ़ना ही असली सफलता की कुंजी है...
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे मजबूत हों... तो सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बावजूद कलेक्टर तक का सफर तय किया जा सकता है.