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मकर संक्रांति और भारतीय युवा: परंपरा से नए अर्थ में ‘रीकनेक्ट’

डॉ अनन्या मिश्र
  • विचार,
  • Updated:
    जनवरी 14, 2026 17:18 pm IST
    • Published On जनवरी 14, 2026 09:59 am IST
    • Last Updated On जनवरी 14, 2026 17:18 pm IST
मकर संक्रांति और भारतीय युवा: परंपरा से नए अर्थ में ‘रीकनेक्ट’

नववर्ष की रात भारत का युवा जब “न्यू ईयर, न्यू मी” लिखकर अपने संकल्प साझा करता है, तो उसी क्षण एक और संकल्प चुपचाप उसके भीतर आकार ले रहा होता है: “न्यू ईयर, न्यू माइंड”. वर्ष 2026 की दहलीज़ पर खड़ा युवा अब नए साल को केवल बेहतर करियर, चुस्त शरीर या आर्थिक अनुशासन तक सीमित नहीं रख रहा. उसके संकल्पों की सूची में अब मन की सफ़ाई, मानसिक संतुलन और आंतरिक अनुशासन भी शामिल हैं. यह एक अद्भुत परिवर्तन है और मकर संक्रांति भी भारतीय परंपरा में एक दिशा-परिवर्तन माना गया है – ऋतु का, सूर्य का और प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य की चेतना का भी.

उत्तरायण का यह क्षण सदियों से त्याग, अनुशासन और आत्म-संयम से जोड़ा गया है. आज का युवा भले ही इस पर्व को वैदिक गणनाओं या ज्योतिषीय भाषा में न समझे, लेकिन उसके भीतर चल रहा मानसिक संवाद उसी दिशा परिवर्तन की आधुनिक अभिव्यक्ति है. वह मकर संक्रांति के आसपास अपने जीवन को “रीसेट” करने की बात करता है, जैसे डिजिटल ब्रेक लेने, दिनचर्या सुधारने, नींद और ध्यान पर ध्यान देने की. वह अनजाने ही उस परंपरा से जुड़ रहा है जो कहती है कि जब सूर्य की चाल बदलती है, तो मनुष्य को भी अपनी चाल पर विचार करना चाहिए. पतंग उड़ाना, तिल-गुड़ बांटना या अलाव के पास बैठना: ये सब बाहरी प्रतीक हैं. लेकिन आज का युवा इन्हें अपने तरीके से जी रहा है, जहां पतंग की डोर भले हाथ में न हो, पर अपने समय, ध्यान और ऊर्जा की डोर को साधने की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है. यही मकर संक्रांति का आधुनिक अर्थ है – रिवाज़ से परे, भाव के स्तर पर परंपरा से जुड़ाव.

तेज प्रतिस्पर्धा, निरंतर अस्थिरता और डिजिटल शोर के बीच यह पीढ़ी समझने लगी है कि बाहरी उपलब्धियां तब तक अधूरी हैं, जब तक भीतर की दुनिया अशांत है. शायद यही कारण है कि मकर संक्रांति आज युवाओं के लिए भी मानसिक पुनर्संयोजन का प्रतीक बनती जा रही है. आज का युवा पतंग उड़ाए या न उड़ाए, लेकिन वह मकर संक्रांति को “नया आरंभ” अवश्य मानता है – डिजिटल डिटॉक्स, माइंडफुलनेस, जर्नलिंग और आत्मचिंतन के रूप में. यह कोई भावनात्मक कल्पना नहीं, बल्कि एक ठोस सामाजिक बदलाव है. ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स की लोकप्रियता इस प्रवृत्ति की पुष्टि करती है. विश्व स्तर पर माइंडफुलनेस और ध्यान से जुड़े ऐप्स के डाउनलोड करोड़ों में हैं और इनमें सबसे बड़ा हिस्सा 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग का है. भारत में भी यही तस्वीर उभर रही है, जहां युवा पीढ़ी मानसिक शांति और आत्म-संतुलन को अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता मानने लगी है.

यह बदलाव केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक भी है. ग्रैंड रिव्यू रिसर्च के अनुसार भारत में ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का बाजार आज लगभग ₹689 करोड़ के आसपास आंका जा रहा है और अगले पांच–छह वर्षों में इसके ₹2670 करोड़ से अधिक तक पहुंचने का अनुमान है. “मन की देखभाल” अब केवल नैतिक उपदेश या निजी साधना नहीं रही. यह एक संगठित उद्योग का रूप ले चुकी है. ऐसे में यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या यह उद्योग युवाओं को वास्तविक मानसिक सशक्तिकरण दे रहा है, या केवल शांति का बाज़ारी संस्करण परोस रहा है.

यहां राजनीति और नीति का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है. जब आध्यात्मिकता और मानसिक स्वास्थ्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर निर्भर होते हैं, तो डेटा गोपनीयता, एल्गोरिदमिक जवाबदेही और भावनात्मक सूचनाओं के व्यावसायिक उपयोग जैसे प्रश्न केवल तकनीकी नहीं रहते, अपितु वे सार्वजनिक हित के प्रश्न बन जाते हैं. नई पीढ़ी मानसिक स्थिरता चाहती है, लेकिन क्या हमारी डिजिटल और नीतिगत संरचनाएं उसे सुरक्षित, संवेदनशील और गैर-शोषणकारी वातावरण प्रदान कर पा रही हैं?

मकर संक्रांति का मूल संदेश है उत्तरायण. यह केवल सूर्य की दिशा परिवर्तन की कथा नहीं है, बल्कि मानव चेतना की दिशा बदलने का संकेत है. आज का युवा उसी संकेत को नए संदर्भ में पढ़ रहा है. वह परंपरा से कट नहीं रहा. वह परंपरा को नए अर्थ दे रहा है. तिल-गुड़ की मिठास अब केवल स्वाद नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन का रूपक बन रही है. पूजा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्म-अवलोकन का माध्यम बन रही है.

यह परंपरा से “डिस्कनेक्ट” होना नहीं है, बल्कि नए अर्थ में “रीकनेक्ट” होना है. रिवाज़ से कम, भाव से अधिक. और शायद यही 2026 का सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संकेत है: भारत का युवा विकास, उत्पादकता और तकनीक की भाषा बोलते हुए, अब अंतर्यात्रा की जरूरत को भी उतनी ही गंभीरता से समझने लगा है. यही समझ मकर संक्रांति को आज भी प्रासंगिक बनाती है और आने वाले समय की दिशा भी तय करती है.

डॉ. अनन्या मिश्र, लेखिका, कम्युनिकेशन एवं ब्रांडिंग सलाहकार 

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं.

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