SDM Vijay Kumar Dahariya Success Story: अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती... यह लाइन सागर जिले में पदस्थ एसडीएम विजय कुमार डहरिया पर फिट बैठता है. SDM विजय कुमार डहरिया ने गरीबी, संघर्ष और लगातार असफलताओं को पीछे छोड़ते हुए सफलता की नई मिसाल कायम की है. सिवनी जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे विजय कुमार डहरिया का बचपन बेहद अभावों में बीता. गांव में न तो बिजली की सुविधा थी और न ही सड़क का समुचित संपर्क... उनके पिता एक छोटे किसान थे, जिनकी सीमित आय में पूरे परिवार का भरण-पोषण होता था. ऐसे हालात में पढ़ाई जारी रखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी.
विजय अपने गांव के इकलौते छात्र थे, जिनका चयन शहर के एक्सीलेंस स्कूल में हुआ था. यही नहीं वो गांव के पहले ऐसे छात्र भी बने, जिन्हें सरकारी नौकरी मिली. उनकी इस उपलब्धि पर आज भी गांव के लोग गर्व महसूस करते हैं.
विजय के पिता पेशे से शिक्षक थे, जिन्होंने बचपन से ही उन्हें पढ़ाई के प्रति प्रेरित किया. इसी का परिणाम रहा कि विजय ने कभी पढ़ाई में लापरवाही या बेईमानी नहीं की और लगातार मेहनत करते हुए सफलता हासिल की.
8 KM पैदल चलकर जाते थे स्कूल
विजय की शुरुआती शिक्षा सिवनी के एक्सीलेंस स्कूल से हुई. पढ़ाई के प्रति उनकी लगन बचपन से ही साफ नजर आती थी. वे गांव के पहले ऐसे छात्र बने, जिन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन कर टॉप किया. आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने सिवनी के सरकारी हॉस्टल में रहकर शिक्षा प्राप्त की. इस दौरान उन्हें रोजाना 7 से 8 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

ट्यूशन पढ़ाकर किया गुजारा
उच्च शिक्षा के लिए विजय का चयन जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ. यहां पहुंचना उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन संघर्ष का दौर अभी खत्म नहीं हुआ था. आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया, जिससे उन्हें करीब एक हजार रुपये मिलते थे. इसी राशि से वे अपने रहने और खाने का खर्च निकालते थे. जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने पेट्रोल पंप पर भी काम किया. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को जिंदा रखा. इसी बीच फॉरेस्ट गार्ड की भर्ती निकली, जिसमें विजय का चयन हो गया. यह उनकी पहली सरकारी नौकरी थी, जिसने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया.

SDM Vijay Kumar Dahariya: पहले फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी, फिर डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ चयन.
लगातार पांच बार मिली असफलता
नौकरी मिलने के बाद भी विजय का सपना यहीं खत्म नहीं हुआ. उन्होंने ठान लिया कि उन्हें एक अधिकारी बनना है. इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की. दिन में नौकरी और रात में पढ़ाई का सिलसिला लगातार चलता रहा. हालांकि सफलता का यह रास्ता इतना आसान नहीं था. विजय को एक-दो नहीं बल्कि लगातार पांच बार असफलता का सामना करना पड़ा. कभी प्रारंभिक परीक्षा में सफल हुए तो मुख्य परीक्षा में रह गए, और कभी इंटरव्यू तक पहुंचकर भी चयन नहीं हो पाया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और छठे प्रयास में उनका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ. यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने उनके संघर्ष को सफलता में बदल दिया.

खेतों से एसडीएम तक: विजय कुमार डहरिया ने संघर्ष, असफलताओं और जुनून से लिखी सफलता की कहानी.
सराहनीय कार्य के लिए हो चुके हैं सम्मानित
वर्तमान में विजय कुमार डहरिया सागर जिले में एसडीएम के पद पर कार्यरत हैं. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई सराहनीय कार्य किए हैं, जिसके लिए उन्हें कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है. बतौर एसडीएम विजय ने शिक्षा के क्षेत्र में कई नवाचार किए हैं. वो न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, बल्कि समय-समय पर बच्चों को पढ़ाने भी पहुंचते हैं. उनके इस प्रयास के लिए उन्हें कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है. विजय का मानना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे इंसान अपने सभी सपनों को पूरा कर सकता है. उनकी कहानी आज ग्रामीण युवाओं के लिए एक मिसाल बनकर सामने आई है. उनकी यह यात्रा न केवल युवाओं के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह भी सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला बुलंद हो तो सफलता जरूर मिलती है.