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एमपी में मनरेगा का हाल-बेहाल! 6 साल में 1% मजदूरों को भी नहीं मिला 100 दिन का पूरा रोजगार

मध्यप्रदेश विधानसभा में पेश आंकड़ों से खुलासा हुआ कि पिछले छह साल में पंजीकृत मजदूरों में से 1% को भी मनरेगा के तहत 100 दिन का पूरा रोजगार नहीं मिला. काम की मांग बनी रहने के बावजूद औसत रोजगार दिन, बजट और मानव‑दिवस घटे हैं.

एमपी में मनरेगा का हाल-बेहाल! 6 साल में 1% मजदूरों को भी नहीं मिला 100 दिन का पूरा रोजगार

MNREGA Crisis in MP: एमपी में मनरेगा की हालत पर विधानसभा में आए नए आंकड़ों ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले छह साल में पंजीकृत मजदूरों में से 1 प्रतिशत लोगों को भी 100 दिन का पूरा रोजगार नहीं मिल पाया. विपक्ष ने इसे ग्रामीण रोजगार प्रणाली की “सबसे बड़ी विफलता” बताते हुए सरकार पर योजना को कमजोर करने और नाम बदलकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है. इन आंकड़ों ने ग्रामीण आजीविका की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

छह साल में 1% को भी नहीं मिला पूरा रोजगार

सदन में पूछे गए प्रश्न के जवाब में पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल ने बताया कि लाखों मजदूरों के पंजीकरण के बावजूद 100 दिन का रोजगार बेहद कम परिवारों को मिला. 2021 में 1 करोड़ 70 लाख से अधिक पंजीकरण हुए, पर केवल 1,23,624 परिवार 100 दिन काम कर पाए. 2022 में पंजीकरण बढ़कर 1.81 करोड़ हुआ, लेकिन यह संख्या गिरकर 63,898 रह गई. 2023 और 2024 में यह गिरावट और बढ़ी, और 2025 में भी केवल 32,560 परिवार ही 100 दिन पूरा कर सके.

कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने कहा कि “छह साल में 1% मजदूरों को भी 100 दिन का काम नहीं मिला, यह योजना की विफलता का साफ संकेत है.”

काम की मांग ज्यादा, लेकिन रोजगार में लगातार गिरावट

आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण परिवार लगातार काम मांग रहे हैं, पर उन्हें उतने दिन काम नहीं मिल पा रहा. कोविड काल में यह मांग और बढ़ गई थी. 2021‑22 में 61 लाख से ज्यादा परिवारों ने काम मांगा. 2024‑25 तक आते‑आते यह संख्या घटकर 44 लाख 79 हजार परिवार रह गई, जबकि प्रति परिवार औसत रोजगार भी 61.84 दिनों से घटकर 49.13 दिन रह गया. मांग और उपलब्धता के बीच यह अंतर बताता है कि योजना से ग्रामीणों की आय लगातार कम होती जा रही है.

मनरेगा का बजट और मानव दिवस दोनों घटे

सरकार के आंकड़े दिखाते हैं कि योजना पर कुल व्यय में भारी गिरावट आई है. 2020‑21 में 9,338 करोड़ रुपए खर्च हुए थे. 2024‑25 में यह घटकर 6,731 करोड़ रह गया. इसी अवधि में बनाए गए कुल मानव‑दिवस भी 34.17 करोड़ से घटकर 18.96 करोड़ पर पहुंच गए. इसका सीधा मतलब है कि मजदूरों को पहले की तुलना में काफी कम काम मिला.

वनाधिकार पट्टाधारकों को 150 दिन रोजगार 

वनाधिकार पट्टाधारक परिवारों को 150 दिन तक काम देने का प्रावधान है, लेकिन आंकड़े बिल्कुल ही कमजोर तस्वीर पेश करते हैं. 2025‑26 में 24 जिलों में एक भी परिवार को 150 दिन का काम नहीं मिला. चार जिलों में सिर्फ एक‑एक परिवार को यह लाभ मिला. आदिवासी जिलों में स्थिति और खराब—झाबुआ में उपलब्धि शून्य रही. अलीराजपुर ही एक जिला था जहाँ अधिकतम 112 परिवारों को 150 दिन का रोजगार मिला.

जॉब कार्ड से लाखों नाम हटाए जाने पर भी विवाद

सदन में सबसे ज्यादा चर्चा उस आंकड़े पर हुई जिसमें जॉब कार्ड से नाम हटाने की संख्या बताई गई. अकेले 2021 में 43 लाख से अधिक मजदूरों के नाम हटाए गए. 2022, 2023, 2024 और 2025 में भी लाखों नाम हटाए गए. विपक्ष का आरोप है कि “इससे लाखों गरीब परिवारों का सुरक्षा कवच ही छीन लिया गया.”

नाम बदलकर योजना को नया रूप देने पर भी सवाल

विपक्ष ने यह भी कहा कि मनरेगा का नाम बदलकर “विकसित भारत–गारंटी फॉर एम्प्लॉयमेंट एंड लाइवलीहुड मिशन (ग्रामीण)” करने और 125 दिन रोजगार देने का वादा केवल कागजों तक सीमित है. प्रताप ग्रेवाल का तर्क था कि “जब 100 दिन भी नहीं दे पा रहे, तो 125 दिन की गारंटी सिर्फ छलावा है.”

सरकार का पक्ष- यह मांग आधारित योजना 

सरकार का कहना है कि मनरेगा मांग आधारित योजना है और नौकरी कार्ड सत्यापन, ई‑केवाईसी जैसी प्रक्रियाएं नियमित रूप से चल रही हैं. सरकार का दावा है कि नियमों के अनुसार ही काम दिया जा रहा है. अंत में योजना की दिशा और उद्देश्य पर बड़ा प्रश्न, विधानसभा में रखे गए आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि पंजीकरण बढ़ा है, लेकिन काम कम मिला है, खर्च और मानव‑दिवस दोनों गिरे हैं 100 और 150 दिन पूरा करने वाले परिवार लगभग गायब हो गए हैं.  

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