मध्य प्रदेश की सड़कों पर गड्ढे और बढ़ते हादसों पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है और केंद्र और राज्य सरकार से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. इस दौरान कोर्ट में सवाल उठा कि जब न्यूक्लियर पावर प्लांट और समुद्र के नीचे मेट्रो बन सकती है तो टिकाऊ सड़कें क्यों नहीं बन सकीं? अब अगली सुनवाई में सड़क गुणवत्ता, गड्ढों से होने वाले हादसों और एजेंसियों की जवाबदेही पर अहम बहस होगी.
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच में मंगलवार को हुई जनहित याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा था. अब कोर्ट ने उन्हें 5 अगस्त तक जवाब दाखिल करने को कहा है. हाईकोर्ट ने इससे पहले 10 नवंबर 2025 को भी नोटिस जारी किया था.
याचिकाकर्ता ने उठाए सवाल
दरअसल, इंदौर निवासी सेवानिवृत्त ट्रेन मैनेजर राजेन्द्र सिंह ने जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में राज्य की सड़कों पर हुए गड्ढों को लेकर पीआईएल दायर की, जिस पर मंगलवार को सुनवाई हुई और याचिकाकर्ता ने कोर्ट में सवाल किया कि जब न्यूक्लियर पावर प्लांट और समुद्र के नीचे मेट्रो बन सकती है तो टिकाऊ सड़कें क्यों नहीं?
2023 की रिपोर्ट का दिया हवाला
आरोप लगाया कि सड़कों के खराब रखरखाव और प्रशासनिक लापरवाही से हादसे बढ़ रहे हैं. याचिका में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2023 रिपोर्ट का हवाला भी दिया. इसमें बताया कि 2020 से 2023 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया.
गड्ढों की वजह से बढ़ा हादसों और मौतों का आंकड़ा
दावा किया कि वर्ष 2023 में गड्ढों से जुड़े हादसों में 31.4% की बढ़ोतरी हुई. याचिका के अनुसार, 2023 में सड़क पर हुए गड्ढों की वजह से 5,840 हादसे हुए और इन्हीं वजह से 2,161 मौतें हुईं. इस दौरान पुणे की करीब 50 साल पुरानी सड़क का उदाहरण भी दिया और बताया कि वह टिकाऊ सड़क है.
ये भी पढ़ें- बाघिन 'राधा' की कहानी: अनाथ हुई, जहर दिया गया पर 28 शावकों को जन्म देकर उसने गुलजार किया MP का जंगल