
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) सरकार ने बेसहारा भिक्षुओं को ठंड से बचाने के लिए आश्रय स्थल योजना (Shelter Yojana) शुरू की थी, ताकि वो छत के नीचे सो सके. इस योजना के तहत आश्रय में बिस्तर, शौचालय से लेकर पेयजल की व्यवस्था की जानी थी. साथ ही महिला और पुरूषों को रहने के लिए अलग व्यवस्थाएं की जानी थी, लेकिन ये योजना सिर्फ कागजों में सिमत रह गई और आज भी बेसहारा भिक्षु ठंड में रहने के लिए मजबूर हैं.
20 भिक्षु खुले आसमान में सोने के लिए मजूबर
दरअसल, दिसंबर के इस सर्द के बीच खरगोन के सनावद बस स्टैंड के पास 20 भिक्षु खुले आसमान में सोने के लिए मजूबर है, क्योंकि इनके पास रहने के लिए ना कोई घर है और ना ही छत. यहां पर रह रहे भिक्षुओं में दो विकलांग है और आठ वृद्ध महिलाएं हैं, जबकि शेष वृद्ध पुरुष हैं. ये सभी ठंडी फर्श पर प्लास्टिक या चादर बिछा कर सोते हैं. कुछ लोहे के बेंच पर सो रहे हैं. तीन महिलाएं थाने के सामने बंद दुकानों के ओटले पर सोती है, लेकिन इनकी ओर प्रशासन का ध्यान नहीं जा रहा है. इतना ही नहीं यहां रह रहे 35 वर्षीय भिक्षु की बीते गुरुवार को ठंड लगने से मौत हो गई.
रैन बसेरा 2015-16 में सरकार के मत से आई थी राशि
बता दें कि इस इलाके में इन भिक्षुओं को रहने के लिए आश्रय स्थल योजना के तहत कमरा बनाने के लिए रैन बसेरा 2015-16 में सरकार के मत से राशि आई थी, लेकिन आज तक नया आश्रय नहीं बन सका और राशि गवन हो गई. इतना ही नहीं नगर पालिका ने अपने रिकॉर्ड में अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए छात्रावास को आश्रय स्थल बताया है, जो वर्तमान में खंडहर हो रहा है.
ये पत्थरों की दिवार और टीन की ढाल से बना भवन सिर्फ 20 X 20 फीट का एक हॉल है उसके आधे भाग में टीन का पार्टीशन कर नगरपालिका के सेवानिवृत्त पेंशनर अशोक जोगे ने कब्जा किए हुए हैं. वहीं शेष भाग पर होटल में काम करने वाले ने व्यक्ति ओम प्रकाश लाड नेअपने बीमार बेटे के साथ गृहस्थी के सामान के साथ कब्जा किया हुआ है.
खंडहर छात्रावास पर दो लोगों का कब्जा
नगर पालिका के सहायक राजस्व अधिकारी वीरेंद्र कपिले ने बताया कि मैं पिछले 4 सालों से लेखा सहायक का कार्य देख रहा हूं. मेरे संज्ञान में नगर पालिका द्वारा मेरे कार्यकाल में आश्रय स्थल के लिए राशि का व्यय नहीं किया गया है. इस आश्रय स्थल पर तो स्थाई रूप से दो लोगों का कब्जा है.
मध्य प्रदेश सरकार ने 2015 में रेन बसेरा योजना को लेकर नगर निकाय को पत्र लिखा था कि नगर में बेसहारा भिक्षुओं के रात्रि विश्राम को लेकर रेन बसेरा भवन बनाए जाए या ऐसे भवन चिन्हित किए जाएं जिसमें नगर पालिका भिक्षुओं के रात्रि विश्राम की व्यवस्था करें और यह भवन में भिक्षु स्थाई रूप से ना रहते हुए सिर्फ रात्रि विश्राम कर सकें. हालांकि इसके बाद नगर पालिका परिषद ने तात्कालिक स्वास्थ्य अधिकारी योगेश गुप्ता को इस संबंध में आदेश दिया था कि वो उक्त छात्रावास को रेन बसेरा के रूप में विकसित करें और इसके लिए नगर निकाय से राशि भी आवंटित की गई थी. नगर निकाय ने उक्त राशि को कागजों मे ही रेन बसेरा की सुविधाओं पर खर्च कर इतिश्री कर ली थी.
नगर पालिका के कार्यरत कर्मचारी कब्जा कर छात्रावास में रहने लगे
उस दौरान उक्त भवन पर नगर पालिका के कर्मचारी भूपेश थोरात का कब्जा था. हालांकि उस समय नपा ने उस भवन को खाली करवाया, लेकिन उसके बाद उक्त भवन पर नगर पालिका के कार्यरत कर्मचारियों ने अपना अधिकार जमा कर उसमें रहने लगे.
बता दें कि साल 2019 से रेन बसेरा योजना को आश्रय स्थल नाम दे दिया गया. इस भवन में आश्रय स्थल की योजना के अनुरूप व्यवस्थाएं नहीं रही और इस भवन पर कर्मचारियों का आज तक कब्जा है.
राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया
इस भवन को लेकर नगर के समाज सेवी दिनेश पाटनी ने नपा से पत्राचार कर रेन बसेरा भवन को कब्जा मुक्त कर शासन की मंशानुरूप भिक्षुओं को रात्रि विश्राम के लिए व्यवस्थित स्थान मिले के लिए प्रयास भी किया. मामला यहां तक पहुंचा कि कब्जे धारी पर नपा ने कार्रवाई करने का मन भी बना लिया, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप से मामला ठंडे बस्ते में चला गया.
वहीं ओमप्रकाश लाड कहते हैं, 'मैं दिसंबर 2022 में विधायक सचिन बिरला के कहने पर अपने बीमार बेटे को लेकर यहां रह रहा हूं. यहां बिजली पानी शौचालय नहीं है. पड़ोस से वायर लेकर बल्ब जला रहा हूं.
ये भी पढ़े: 'भ्रष्टाचार' की पोल खोलता सूरजपुर का पुल, ठेकेदार और विभाग की मिलीभगत के लगे आरोप