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बजट 2026: 'काजू-कॉफी बड़े लोगों के लिए,हमें अनाज के सही दाम दें',बजट पर छलका सीहोर के किसानों का दर्द

Union Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026 पर सीहोर के बड़े किसान एम.एस. मेवाड़ा ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए गेहूं और सोयाबीन के दामों पर सरकार को घेरा है. उनका कहना है कि सरकार का ध्यान काजू-बादाम और ड्राई फ्रूट्स पर है, जबकि आम किसान अनाज की सही कीमत और सम्मान निधि बढ़ने का इंतजार कर रहा है. शिवराज सिंह चौहान से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे मध्य प्रदेश के किसानों के लिए इस बजट में उनकी बुनियादी फसलों को लेकर कोई ठोस राहत नहीं दिखी है.

बजट 2026: 'काजू-कॉफी बड़े लोगों के लिए,हमें अनाज के सही दाम दें',बजट पर छलका सीहोर के किसानों का दर्द

MP Farmers Budget Reaction: मध्य प्रदेश,देश का सबसे बड़ा गेहूं और दाल उत्पादक राज्य,अपनी उपजाऊ काली मिट्टी और सोयाबीन,चना व दालों के अंतहीन खेतों के लिए जाना जाता है. इस बार बजट पर यहां के किसानों की नजरें खास तौर पर टिकी थीं, क्योंकि देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद सीहोर की इसी मिट्टी से आते हैं. लेकिन बजट के बाद गांवों में जो भाव है, वह उत्सव का नहीं, निराशा का है. सरकार ने बजट में किसानों के लिए कई घोषणाएं कीं हैं. नारियल उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष प्रोत्साहन,वैज्ञानिक तरीके से चंदन की खेती,पहाड़ी क्षेत्रों में बादाम,अखरोट,काजू और कोको जैसी उच्च-मूल्य फसलों पर फोकस किया गया है. इसके अलावा नारियल प्रोत्साहन योजना के जरिए उत्पादन बढ़ाने की बात भी कही गई. 

"सपने साकार करने का महाकाव्य है ये बजट"

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बजट को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बताया. उन्होंने कहा कि यह बजट विकसित भारत के सपने को साकार करने का महाकाव्य है, यह डेवलप्ड इंडिया का डायनामिक बजट है. उनके मुताबिक कृषि बजट 1.32 लाख करोड़ रुपये का है, उर्वरकों पर 1.70 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी दी गई है ताकि किसानों की लागत घटे. ग्रामीण विकास विभाग के बजट में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, पंचायतों को सीधे मिलने वाली राशि दोगुनी की गई है और ‘विकसित भारत' के लिए रिकॉर्ड प्रावधान किए गए हैं. उन्होंने यह भी बताया कि लखपति दीदी और SHE-मार्ट जैसी पहलों से ग्रामीण महिलाएं उद्यमी बनेंगी और यह बजट विकसित, स्वावलंबी और रोजगारयुक्त गांवों का निर्माण करेगा. 

'गोल्डन ग्रेन' देने वाला सीहोर खुश नहीं

जाहिर है कागज़ पर यह सब एक मजबूत तस्वीर बनाता है. लेकिन मध्य प्रदेश के गांवों में, जहां काली मिट्टी सिर्फ फसल नहीं उगाती बल्कि उम्मीदें भी बोती है, यह तस्वीर अधूरी लगती है. यह वही प्रदेश है जो देश का पेट भरता है.

गेहूं और दालों में सबसे आगे. सोयाबीन,चना,मसूर,प्याज और लहसुन की धरती है ये. सबसे ऊपर शरबती गेहूं सुनहरा,मुलायम और मीठा जिसे बाजार “गोल्डन ग्रेन” कहता है वो सीहोर की जमीन की ही देन है.

किसानों को भरोसा था कि जो इस मिट्टी को जानता है,वह उनकी तकलीफ भी समझेगा. लेकिन बजट के बाद आज यहां के गांवों में खुशी नहीं है.

"भाषणों में ही काजू अच्छे लगते हैं"

सीहोर जिले में ही लगभग साढ़े तीन लाख हेक्टेयर में खेती होती है. अधिकांश क्षेत्र सिंचित है. खरीफ में सोयाबीन,रबी में गेहूं और चना यही यहां की असली खेती है. चंदेरी के किसान एम.एस.मेवाड़ा, जिनके पास 75 एकड़ जमीन है, कहते हैं कि उम्मीदें बहुत बड़ी थीं. गांवों में चर्चा थी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में ठोस बढ़ोतरी होगी. सोयाबीन का भाव आठ हजार के करीब पहुंचेगा, गेहूं को सम्मानजनक दाम मिलेगा, प्याज जैसी फसलों को सुरक्षा मिलेगी. यह भी माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके बजाय, वे कहते हैं, किसानों को बादाम, काजू, कॉफी और कोको की बातें सुनाई गईं. उनका सवाल सीधा है सीहोर का किसान इन्हें उगाएगा कहां? यह मिट्टी गेहूं और सोयाबीन की है, बागानी फसलों की नहीं. उनका कहना है कि देश में हर कोई गेहूं खाता है, लेकिन जब उसकी कीमत तय करने की बात आती है तो किसान पीछे छूट जाता है. भाषणों में काजू अच्छे लगते हैं, लेकिन वे किसान का पेट नहीं भरते. 

"हमें उम्मीद दी गई, सहारा नहीं"

युवा किसानों के लिए यह विरोधाभास और भी चुभता है. 12 एकड़ में खेती करने वाले गब्बर मेवाड़ा कहते हैं कि किसानों ने सरकार पर भरोसा किया, नारों पर भरोसा किया.

अब उन्हें लगता है कि भरोसे के बदले हाथ में कोई चमकदार लेकिन बेकार चीज़ थमा दी गई है. लागत बढ़ रही है बीज, खाद, डीज़ल, मजदूरी लेकिन फसल के दाम को लेकर आज भी अनिश्चितता है. उनके शब्दों में,किसानों को उम्मीद दी गई,सहारा नहीं.छोटे किसानों की पीड़ा और गहरी है.

उलझावन गांव के प्रेम नारायण मेवाड़ा के पास सिर्फ पांच एकड़ जमीन है. हाल की ओलावृष्टि ने पूरी फसल बर्बाद कर दी. गांव में हड़कंप मच गया. लोग अधिकारियों का इंतजार करते रहे. कोई नहीं आया. न सर्वे हुआ, न मुआवज़े की घोषणा. वे कहते हैं कि बजट से कम से कम फसल बीमा पर कोई मजबूत भरोसा मिलने की उम्मीद थी. लेकिन वहां भी सन्नाटा रहा. कुछ ही मिनटों में खेत उजड़ गए और किसानों का दर्द बजट भाषणों से बाहर रह गया. 

"खाली खेत और बढ़ते कर्ज का क्या करें?"

कृषि मंत्री कहते हैं कि यह बजट किसानों की आय बढ़ाकर गरीबी दूर करेगा और विकसित भारत के सपने को साकार करेगा. गांवों में किसान यह सुनते हैं, लेकिन फिर अपने खाली खेतों और बढ़ते कर्ज की तरफ देखते हैं. मध्य प्रदेश आज गेहूं में पंजाब और हरियाणा से आगे है. चना,दाल,सोयाबीन और तिलहनों में देश का नेतृत्व करता है.देश की लगभग 44 प्रतिशत औषधीय फसलें यहीं उगती हैं.यहां के मसाले दुनिया भर में पहुंचते हैं. इन खेतों के टमाटर हर रसोई तक जाते हैं.फिर भी आज इस धरती के किसान बेचैन हैं.बजट से पहले यही किसान एनडीटीवी से बात करते हुए उम्मीद से भरे थे. उन्हें लगता था कि इस बार बजट उनकी जमीन, उनकी फसल और उनकी मेहनत की बात करेगा. बजट के बाद उनकी आवाज़ थकी हुई लगती है. 

किसान सम्मान निधि में बढ़ोतरी होनी चाहिए थी

खेत अब भी सुनहरे हैं. लेकिन उन्हें जोतने वालों के दिल आज भारी हैं. कागज़ पर यह बजट विविधता और नवाचार की तस्वीर पेश करता है, लेकिन मध्य प्रदेश के गांवों में इसकी आवाज़ दूर की लगती है.  यहां की काली मिट्टी सिर्फ फसल नहीं उगाती, उम्मीदें भी पालती है. इसी वजह से इस साल का बजट गांव-गांव में गर्व और उम्मीद के अजीब से मेल के साथ देखा जा रहा था.किसानों की अपेक्षाएं बहुत साधारण थीं न्यूनतम समर्थन मूल्य में ठोस बढ़ोतरी, बढ़ती लागत से राहत और फसल बीमा की मजबूत सुरक्षा. गांवों में यह भी चर्चा थी कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाई जाएगी.लेकिन मध्य प्रदेश के गांवों में सवाल बेहद सीधा है, वो मावठे से गिरी अपनी फसलों की तरफ इशारा करके पूछते हैं, इस मौसम में हमारे साथ कौन खड़ा होगा. हालांकि जानकारों का तर्क है कि ये बजट भविष्य की बात करता है. ‘भारत विस्तार' नाम का बहुभाषी एआई टूल किसानों को उनकी भाषा में सलाह देगा. छह करोड़ किसानों का डिजिटल रजिस्टर बनेगा. एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण मिलेगा. इसके अलावा देशभर में भंडारण क्षमता बढ़ाई जाएगी. अब  मत्स्य,डेयरी और पशुपालन के लिए ज्यादा धन मिलेगा. 
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