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NH-719 बना ‘मौत का हाईवे’: 11 महीनों में 241 मौतें, हर दिन औसतन 2 हादसे; टू-लेन सड़क भी बनी जानलेवा

Madhya Pradesh News: ग्वालियर से भिंड से होते हुए यूपी के इटावा जिले को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे-719 पर हर रोज करीब 20 हजार वाहन गुजरते हैं. जिसकी वजह से यह यहां आए दिन सड़क दुर्घटना होती है. इन घटनाओं में कई घरों के चिराग बुझ गए, लेकिन राजनेता और अधिकारियो ने इन हादसों पर चुप्पी साधी है.

NH-719 बना ‘मौत का हाईवे’: 11 महीनों में 241 मौतें, हर दिन औसतन 2 हादसे; टू-लेन सड़क भी बनी जानलेवा

National Highway-719: भिंड जिले में नेशनल हाईवे-719 (ग्वालियर-इटावा रोड) अब तक का सबसे बड़ा 'मौत का हाईवे' साबित हुआ है. पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 के 11 महीनों (जनवरी से नवंबर) में यहां 670 सड़क हादसे हुए, जिनमें 241 लोगों की जान चली गई. यानी हर रोज औसतन 2 हादसे हो रहे हैं. यह पिछले 7 सालों में सबसे बड़ा आंकड़ा है. इतना ही तीन सालों में 2014 हादसे हुए, इनमें 611 लोगों की मौत हुई. साल 2022 में कुल 712 हादसे हुए, जो 2023 में घटकर 619 रह गए.

218 लोगों की गई जान

2024 के आकड़ों की बात की जाए तो यहां 683 हादसे में 218 लोगों की जान चली गई. ग्वालियर से इटावा तक इस हाईवे की कुल लंबाई 110 किलोमीटर है, जिसमें से 90 किलोमीटर हिस्सा भिंड जिले में आता है. ग्वालियर से भिंड से होते हुए यूपी के इटावा जिले को जोड़ने वाले इस हाइवे को का ज्यादातर ऐसा टू लाइन है. 

इस टू-लेन हाईवे पर हर रोज करीब 20 हजार वाहन गुजरते हैं. जिसकी वजह से यह यहां आए दिन सड़क दुर्घटना होती है. इन घटनाओं में कई घरों के चिराग बुझ गए, लेकिन राजनेता और अधिकारियो ने इन हादसों पर चुप्पी साधी है.

चंबल पुल की चौड़ाई नहीं

इस हाइवे की आखिर वजह क्या  है? ये जानने के लिए एनडीटीवी ने चंबल पुल से भिंड जिला मुख्यालय तक 20 किलो मीटर का सफार तय किया. तो हादसों की कई वजह सामने आई. ये हाईवे नहीं... सिंगल रोड है चंबल पुल मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा को जोड़ता है. एनडीटीवी ने हाईवे की पड़ताल इसी पुल से शुरू की. चंबल पुल की चौड़ाई ज्यादा नहीं है. यहां सड़क काफी संकरी हो जाती है. जब पुल के दोनों से तरफ से ट्रक या भारी वाहन गुजरते हैं तो दोनों गाड़ियों के बीच बहुत कम स्पेस रहता है.

न पर्याप्त साइन बोर्ड है, न ही डिवाइडर...

चंबल पुल से मालनपुर तक 80 किलो मीटर हाईवे पर हर दो से तीन किलोमीटर की दूरी पर कोई न कोई गांव या कस्बा पड़ता है. खास बात ये है कि इस हाईवे से चार विधानसभा क्षेत्र अटेर, भिंड, मेहगांव, गोहद भी जुड़ी है. इसके बाद भी हाईवे पर न पर्याप्त साइन बोर्ड है, न ही डिवाइडर...

कई लोग लापरवाह

फूप कस्बे के रहने वाले स्थानीय लोगों से जब बात हुई तो उन्होंने बताया कि यह दो लेन हाईवे है और अकसर वाहन ओवरटेक करते समय रॉग साइड में आजाते हैं. जिससे सामने से कोई तीसरा वाहन आ जाए तो हादसे की आशंका बहुत बढ़ जाती है. हाईवे में गड़बड़ी तो है ही, कई लोग लापरवाही भी बरतते है. हाईवे पर दो से तीन साल पहले तक 16 डेंजर पॉइंट थे. प्रशासन का दावा है कि इनमें से 11डेंजर पॉइंट को सुधार दिया गया है. यानी अब केवल 5 ही डेंजर पॉइंट बचे हैं, लेकिन एनडीटीवी की पड़ताल में सामने आया कि यहां हादसे थमे नहीं है. सिलसिलेबार जानिए इन डेंजर पॉइंट के बारे में...

  • पहला डेंजर पॉइंट निबुआ की चौकी, जो चंबल पुल से भिंड के रास्ते पड़ते है. दोनों ओर से सीधी सड़कों का हाईवे से जुड़ाव है, लेकिन न कोई साइन बोर्ड है और न सुरक्षा संकेतक. अचानक आने वाले वाहन अक्सर हादसों का कारण बनते हैं. भदाकुर मोड़ से लेकर मुख्य बाजार तक कई गंभीर हादसे हो चुके हैं. भदाकुर मोड़ से लेकर मुख्य बाजार तक कई गंभीर हादसे हो चुके हैं. भीड़भाड़ और नियमों की अनदेखी यहां की प्रमुख समस्याएं हैं.
  • दूसरा डेंजर पॉइंट कनकूरा से डिडी पुल तक... यहां गांवों के रास्ते सीधे हाईवे से जुड़ते हैं, जिससे तेज रफ्तार में चल रहे वाहन टकराते हैं. क्वांरी पुल पर ब्रेकर और संकेतक मौजूद हैं. बावजूद हादसे हो रहे.
  • तीसरा पॉइंट भिंड बटालियन से सुभाष तिराहा तक... एक साल में तेज रफ्तार के कारण यहां 3 से 4 लोगों की जान जा चुकी है.
  • चौथा पॉइंट दबोहा मोड़, यहां वाहन हाईवे पर सीधे चढ़ते हैं. स्पीड ब्रेकर और साइन बोर्ड होने के बावजूद हादसे लगातार हो रहे हैं.
  • पांचबा लावन मोड़ और बरोही गांव, यहां रिहाइशी इलाके होने के कारण हादसे होने की बात सामने आई.
  • छटबा मेहगांव क्षेत्र- यहां सड़क चौड़ी की गई है, बस स्टैंड बनाए गए हैं और सेफ्टी जाली भी लगाई गई है. बावजूद इसके दुर्घटनाओं की रफ्तार नहीं थमी.  गिंगरिखी, बहुआ, बरहद और हरिराम की कुइया यहां स्पीड ब्रेकर और संकेतक तो लगाए गए हैं, लेकिन वो पर्याप्त नहीं हैं. सुधार कार्य नाकाफी साबित हो रहे हैं.
  • छीमका और गोहद चौराहा: छीमका में सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं, लेकिन वे बेअसर रहे. गोहद चौराहे पर ट्रैफिक का दबाव ज्यादा है और ब्लैक स्पॉट सुधार के बाद भी हादसे कम नहीं हुए. यहां साइन बोर्ड को अज्ञात वाहन ने टक्कर मारकर गिरा दिए है.
  • मालनपुर इंडस्ट्रियल एरिया: यहां साइन बोर्ड को अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी, जो टूटा जमीन पर मिला. यह क्षेत्र दिन-रात भारी ट्रैफिक के दबाव में रहता है.

सड़क मानक के अनुसार, प्रतिदिन 10,000 वाहन तक ट्रैफिक होने पर टू-लेन सड़क पर्याप्त मानी जाती है. 20,000 वाहन ट्रैफिक होने पर फोरलेन की आवश्यकता होती है. यदि प्रतिदिन 30,000 से अधिक वाहन चलते हैं, तो उस मार्ग को सिक्सलेन होना चाहिए.

सबसे ज्यादा शिकार होते हैं टू-व्हीलर्स 

एक्सपर्ट की माने तो इस हिस्से पर ट्रैफिक बहुत अधिक है. इस हाईवे का अधिकांश हिस्सा अनडिवाइडेड है, बीच में कोई डिवाइडर नहीं है. ऐसी स्थिति में कैपीसिटी के अनुसार, फोरलेन या सिक्सलेन करना सबसे उपयुक्त रहेगा. इसके अलावा देखा गया है कि जो रिहायशी क्षेत्र हैं वहां टू-व्हीलर्स के हादसे बहुत ज्यादा होते हैं, जिसमें मौत तक हो जाती है.

ऐसे रोका जा सकता है हादसे

जरूरी है कि ऐसी जगहों पर सर्विस लेन का प्रावधान हो, जिससे उस इलाके के लोग हाईवे को आकर न मिलें. साथ ही व्हीकल अंडरपास और थ्रू ट्रैफिक के लिए ओवर पास बनाए जा सकते हैं. ऐसा करने से हादसों को रोका जा सकता है. नाइट टाइम विजिबिलिटी भी एक कारण हो सकता है, जो रिहायशी इलाके हैं वहां लाइट की प्रॉपर व्यवस्था होना चाहिए.
वाहनों की रफ्तार को कम करने के लिए ट्रांसवर्स बार मार्किंग जैसे माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं. साथ ही साथ यह जरूरी है कि हम साइन बोर्ड, रोड मार्किंग करें.

सख्ती के साथ यह भी किया जाना चाहिए कि नशा करके ड्राइविंग पर रोक लगा सकें. पब्लिक अनाउंसमेंट से लोगों को बताया जा सके, एजुकेट किया जा सके.

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