"बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना,
दरिया जहां समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता."
यह मशहूर शेर लिखने वाले और अपनी मखमली आवाज व सादगी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र (सैयद मोहम्मद बशीर) अब हमारे बीच नहीं रहे. उत्तर प्रदेश की पावन धरती अयोध्या में 15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर साहब ने भोपाल में 28 मई 2026 की दोपहर को अंतिम सांस ली.
पिता के साये के बाद खाकी वर्दी, फिर शुरू हुआ अदबी सफर
बशीर बद्र का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा. जब वह महज 15-16 साल के थे, तभी उनके वालिद (पिता) का इंतकाल हो गया था. परिवार की जिम्मेदारी के कारण उन्हें मजबूरी में पुलिस की नौकरी जॉइन करनी पड़ी. हालांकि, उनके भीतर का शायर खाकी वर्दी में भी जिंदा रहा. पुलिस सेवा के दौरान जब उन्हें तरक्की (प्रमोशन) की पेशकश हुई, तो उन्होंने शायरी के प्रति अपने इश्क के खातिर उसे ठुकरा दिया था.
AMU से पढ़ाई और मेरठ कॉलेज में लेक्चरर का सफर
साल 1969 में बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर की उपाधि ली. इसके बाद 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर जॉइन किया. वे यहां वर्ष 1990 तक रहे. मेरठ कॉलेज में पढ़ाने के दौरान ही उन्होंने दुनिया भर के मुशायरों में अपनी शायरी का लोहा मनवाया.
1974-1990: बशीर साहब के जीवन का स्वर्णिम काल
मेरठ कॉलेज में लेक्चरर रहने के दौरान (1974 से 1990 के बीच) का दौर बशीर बद्र के जीवन का स्वर्णिम काल माना जाता है. इसी दौर में वे शायरी की बुलंदियों को छू रहे थे. उन्होंने देश ही नहीं बल्कि अमेरिका, पाकिस्तान और ब्रिटेन सहित विदेशों में 500 से ज्यादा मुशायरों में शिरकत की और भारत का नाम रोशन किया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनके मुशायरों के मुरीद थे और अक्सर उनकी शायरी सुनने आया करते थे.
डॉ. बशीर बद्र के जीवन का एक भावुक पल साल 2021 में आया, जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने उन्हें पूरे 46 साल बाद पीएचडी की डिग्री दी. जब यह डिग्री उनके भोपाल स्थित घर पहुंची, तो वयोवृद्ध शायर ने भावुक होकर उसे अपने सीने से लगा लिया था.
सादा भाषा, गहरा असर और पद्मश्री से सम्मान
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत उनकी गजलों की आसान और असरदार भाषा थी. उन्होंने क्लिष्ट उर्दू की जगह आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे वे सीधे लोगों के दिलों में उतर गए. कला और साहित्य के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए साल 1999 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित सम्मान 'पद्मश्री' से नवाजा गया था.
आज भले ही बशीर बद्र साहब हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका यह शेर हमेशा जिंदा रहेगा.
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए."
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