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सरकार का वादा फेल... पर लोगों ने नहीं मानी हार, बड़वानी में ग्रामीणों ने बना दिया 80-90 फीट लंबा झूला पुल

Barwani News: टापू से जागीरदारपुरा के नवीन घाट तक लगभग 80 से 90 फीट लंबा रस्से का झूला पुल तैयार कर लिया है. चार–पांच दिनों में ग्रामीण लगातार मेहनत कर इस पुल को बना दिया. रस्से, लकड़ी और टिनशेड के सहारे तैयार किया गया.

सरकार का वादा फेल... पर लोगों ने नहीं मानी हार, बड़वानी में ग्रामीणों ने बना दिया 80-90 फीट लंबा झूला पुल

Barwani Suspension Bridge: जब रास्ते बंद होने लगते है तो कोई ऐसा रास्ता खुल जाता है... जो लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बन जाता है. दरअसल, ऐसा ही कुछ बड़वानी महज 7 किलोमीटर दूर कुकरा गांव में हुआ... जब बैक वाटर के चलते सारे रास्ते बंद हो गए और सरकारी तंत्र जब गांव वालों के लिए रास्ते की कोई व्यवस्था नहीं कर पाया तो गांव वालों ने खुद ही अपने दम पर झूला पुल बना कर अपना रास्ता बना लिया. हालांकि ये देखने में खतरनाक जरूर लगता है, लेकिन गांव के लोगों को इस रास्ते से अब राहत मिली है.

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ग्रामीणों ने बनाया झूला पुल 

सरदार सरोवर बांध परियोजना के कारण नर्मदा नदी का बैकवॉटर लगातार बढ़ रहा है. मंगलवार को नर्मदा का जलस्तर 137.20 मीटर तक दर्ज किया गया. जलस्तर बढ़ने से राजघाट के समीप स्थित जागीरदारपुरा टापू चारों ओर से पानी से घिर गया है. ऐसे में यहां रहने वाले ग्रामीणों ने अपनी जरूरत के लिए अनोखा उपाय खोज निकाला.

80 से 90 फीट लंबा रस्से का झूला पुल तैयार

टापू से जागीरदारपुरा के नवीन घाट तक लगभग 80 से 90 फीट लंबा रस्से का झूला पुल तैयार कर लिया है. चार–पांच दिनों में ग्रामीण लगातार मेहनत कर इस पुल को बना दिया. रस्से, लकड़ी और टिनशेड के सहारे तैयार किया गया. यह झूला पुल अब खेतों तक पहुंचने का एकमात्र साधन बन गया है. दोनों ओर मजबूत पेड़ों से रस्सों को बांधकर पुल को सुरक्षित किया गया है और नीचे लकड़ी का मचान बनाकर उस पर लोहे की टिनशेड लगाई जा रही है.

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ग्रामीण देवेंद्र सोलंकी बताते हैं कि हर साल की तरह इस बार भी बैकवॉटर बढ़ने से आवाजाही मुश्किल हो गई थी. प्रशासन ने टापू से बड़वानी तक नाव की सुविधा दी है, लेकिन ग्रामीणों के खेत नदी के उस पार नवीन घाट की तरफ हैं. नाव से सीधे खेतों तक पहुंचना संभव नहीं था. यही वजह है कि गांववालों ने खुद मिलकर यह पुल बना डाला.

संघर्ष की ये कहानी 

टापू पर 17 परिवार लंबे समय से प्लॉट और मुआवजे की मांग को लेकर संघर्षरत हैं. फिलहाल यहां 3–4 परिवार ही रह रहे हैं, जो बैकवॉटर से घिरे हालात में भी अपने मवेशियों के साथ जीवन बिता रहे हैं.

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2019 में जब बांध पूरी तरह भरा था, तब प्रशासन ने टापूवासियों को अस्थायी टिनशेड में शिफ्ट किया था और एक महीने में समाधान का आश्वासन दिया था. लेकिन वादे पूरे नहीं हुए... 2023 में जब जलस्तर 143 मीटर तक पहुंचा, तब ऊंचे टापू पर बने घर भी डूब गए और कई मकान ढह गए. मजबूरी में अधिकांश लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गए, लेकिन कुछ ने फिर टूटे घरों को सुधारकर वापस वहीं बसेरा बना लिया.

हार मानने की बजाय ग्रामीणों ने निकाला जुगाड़ से रास्ता

आज हालात यह हैं कि टापू पर जिंदगी फिर से पानी से घिरी है, लेकिन ग्रामीणों ने हार मानने के बजाय जुगाड़ से रास्ता निकाला और रस्सा पुल बनाकर अपनी जिंदगियों की राह आसान कर ली. यह झूला पुल सिर्फ ग्रामीणों की जुगाड़ तकनीक का उदाहरण नहीं, बल्कि इस बात का सबूत भी है कि जब जरूरत हद से ज्यादा बढ़ जाए तो इंसान खुद अपने समाधान खोज लेता है.

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