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गुरुजी चयन प्रक्रिया पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अब खराब रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे शिक्षक

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती और नियमितीकरण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार केवल बरी होने के आधार पर शिक्षक बनने का दावा नहीं कर सकते. बच्चों का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों का चरित्र और आचरण बेदाग होना जरूरी है.

गुरुजी चयन प्रक्रिया पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अब खराब रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे शिक्षक

बच्चों को शिक्षा देना सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है. यही वजह है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती और नियमितीकरण को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, उन्हें सिर्फ इसलिए शिक्षक बनने का अधिकार नहीं मिल सकता क्योंकि वे किसी मामले में बरी हो गए हैं. 

बच्चों का भविष्य संवारने वाले शिक्षक का चरित्र, आचरण और सामाजिक छवि पूरी तरह बेदाग होना जरूरी है. इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने एक गुरुजी की नियमितीकरण की मांग खारिज कर दी, जिसके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं. इस फैसले को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया और सरकारी सेवाओं में चरित्र सत्यापन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

गुरुजी के नियमितीकरण को लेकर पहुंचा था मामला

यह मामला धर्मेंद्र रघुवंशी नामक शिक्षक से जुड़ा है, जो वर्ष 1997 से राजीव गांधी शिक्षा गारंटी योजना के तहत गुरुजी के रूप में कार्यरत थे. जब विभाग ने नियमित सेवा के लिए पात्र कर्मचारियों की सूची तैयार की, तब उनका नाम उसमें शामिल नहीं किया गया. इस फैसले के खिलाफ उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में याचिका दायर कर नियमितीकरण की मांग की थी.

सुनवाई में सामने आए 20 आपराधिक मामले

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संबंधित शिक्षक के खिलाफ कुल 20 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं. इनमें एनडीपीएस एक्ट और महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराधों के मामले भी शामिल हैं. शासन का पक्ष था कि ऐसे रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को नियमित सरकारी सेवा में शामिल करना उचित नहीं माना जा सकता.

याचिकाकर्ता ने बरी होने का दिया तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह कई मामलों में बरी हो चुका है. इसलिए उसके पुराने मामलों को आधार बनाकर नियमितीकरण से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता का कहना था कि लंबे समय से शिक्षा विभाग में सेवाएं देने के कारण उसे नियमित कर्मचारी का दर्जा मिलना चाहिए.

हाईकोर्ट ने अपनाया सख्त रुख

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के बरी हो जाने मात्र से उसका पूरा पिछला रिकॉर्ड अप्रासंगिक नहीं हो जाता. नियुक्ति देने वाले विभाग को उम्मीदवार के चरित्र और पृष्ठभूमि की जांच करने का पूरा अधिकार है.

बच्चों के भविष्य से जुड़ा है शिक्षक का दायित्व

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षक केवल पढ़ाने का काम नहीं करता, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण और भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ऐसे में यह जरूरी है कि शिक्षक का चरित्र और आचरण समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करे. अदालत ने टिप्पणी की कि बच्चों को सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल उपलब्ध कराना शिक्षकों की जिम्मेदारी है.

नैतिक छवि भी भर्ती का महत्वपूर्ण आधार

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी सेवाओं, विशेषकर शिक्षा विभाग में नियुक्ति के दौरान केवल शैक्षणिक योग्यता ही पर्याप्त नहीं है. उम्मीदवार की नैतिक छवि, सामाजिक व्यवहार और आपराधिक इतिहास भी महत्वपूर्ण कारक हैं. यदि किसी व्यक्ति की पृष्ठभूमि विवादित रही है तो विभाग उसके चयन या नियमितीकरण पर विचार करते समय उस रिकॉर्ड को देख सकता है.

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