Bagheswar Dham Holi 2026: बागेश्वर धाम में इस बार होली खास रंग में नजर आई. पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भक्तों के साथ ढोल-नगाड़ों और डमरू की थाप पर उत्सव मनाया. पूरे परिसर में फूल, गुलाल और रंगों की बरसात हुई. हजारों श्रद्धालु भक्ति और उमंग के माहौल में शामिल हुए, जहां पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने प्रेम और सद्भाव का संदेश देते हुए होली मिलन भी किया.
बागेश्वर धाम परिसर में सुबह से ही होली की रौनक दिखी. पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नगाड़ा बजाते और डमरू दल की ताल पर झूमते नजर आए. बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में पहुंचे और फूलों व गुलाल के साथ शालीन और भक्तिमय तरीके से होली खेली. सुरक्षा कर्मियों के साथ भी धीरेंद्र शास्त्री ने होली मिलन कर सबको प्रेम और एकता का संदेश दिया.
फूलों और गुलाल की होली
आयोजन में फूल और गुलाल की बारिश ने माहौल को और खास बना दिया. श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को रंग लगाया और ‘होली है' के जयकारों के साथ तालियां गूंजती रहीं. भीड़ के बीच संयम और व्यवस्था बनाए रखते हुए कार्यक्रम सुचारू रूप से चलता रहा, जिससे हर कोई सुरक्षित और आनंदपूर्ण अनुभव लेकर लौटा.
खजुराहो में सतरंगी होली की धूम
इधर छतरपुर जिले के विश्व प्रसिद्ध खजुराहो में होली का नजारा देखने लायक रहा. मंदिरों की घंटियां, ढोल-नगाड़ों की गूंज और हवा में उड़ते अबीर-गुलाल के बीच पूरा वातावरण उत्साह से भर उठा. मंदिर समूह के आसपास श्रद्धालु और पर्यटक एक-दूसरे को गुलाल लगाकर बधाई देते नजर आए. यह दृश्य भारत की मिश्रित सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप दिखाता है.
ऐतिहासिक मंदिरों के बीच रंगों का उत्सव
Western Group of Temples के आसपास का क्षेत्र होली के रंगों से निखर गया. गलियों में लोक-धुनें बजीं, फाग के पारंपरिक गीतों पर लोग थिरके और फोटो व वीडियोज़ के जरिए पर्यटकों ने अपने अनुभव कैद किए. मंदिरों की पृष्ठभूमि और रंगों का संगम खजुराहो की पहचान को और खास बना देता है.
विदेशी मेहमान भी रंग में रंगे
खजुराहो में विदेशी पर्यटकों का उत्साह देखने लायक रहा. इटली से आए सात सदस्यीय दल ने स्थानीय लोगों और दुकानदारों के साथ होली खेली. उनका कहना था कि दुनिया में कई त्योहार देखे, पर भारत की होली जैसा दिलों को जोड़ने वाला उत्सव कहीं नहीं. ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया और फ्रांस से आए सैलानियों ने भी खुले दिल से रंगों का आनंद लिया.
बुंदेली रंग में ‘फाग' की थाप
खजुराहो और आसपास के इलाकों में पारंपरिक ‘फाग' लोकगीत और नृत्य ने उत्सव में लोक-संस्कृति का रंग भरा. ढोलक, झांझ और मनभावन धुनों के साथ महिलाओं और युवाओं की टोली देर तक गाती-नाचती रही. यह मेलजोल “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को साकार करता है.