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'SUR' कलाकारों के दर्द को दर्शाती है, जिन्हें कभी उनका हक नहीं मिला- दिब्येंदु भट्टाचार्य

SUR Latest: अपनी भूमिका के बारे में बात करते हुए दिब्येंदु ने कहा कि यह किरदार उन असंख्य माता-पिताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके अधूरे सपने समय के साथ कड़वाहट में बदल जाते हैं.

'SUR' कलाकारों के दर्द को दर्शाती है, जिन्हें कभी उनका हक नहीं मिला- दिब्येंदु भट्टाचार्य
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SUR Latest: अभिनेता दिब्येंदु भट्टाचार्य (Dibyendu Bhattacharya) ने लघु फिल्म सुर (SUR) में अपनी भूमिका के बारे में खुलकर बात की. यह एक गहन भावनात्मक कहानी है, जो संघर्षरत पिता और अपने कलात्मक सपनों को छोड़ने से इंकार करने वाले बेटे के बीच के नाजुक रिश्ते को सामने लाती है. फिल्म में दिब्येंदु एक ऐसे प्रतिभाशाली चित्रकार की भूमिका निभाते हैं, जिसने अपनी दृष्टि, आजीविका और उम्मीद सब कुछ खो दिया है. मुंबई की एक तंग चॉल में रहने वाला यह किरदार अपनी निराशा अपने बेटे संदीप पर उतारता है, जिसकी भूमिका रोशन चौहान ने निभाई है. संदीप का संगीत के प्रति जुनून परिवार की कठोर आर्थिक परिस्थितियों से टकराता है. जैसे-जैसे दबाव बढ़ता है, पिता की हताशा मौन, क्रोध और अंततः अस्वीकृति में बदल जाती है.

माता-पिताओं का प्रतिनिधित्व

अपनी भूमिका के बारे में बात करते हुए दिब्येंदु ने कहा कि यह किरदार उन असंख्य माता-पिताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके अधूरे सपने समय के साथ कड़वाहट में बदल जाते हैं. उन्होंने कहा कि वह खलनायक नहीं है, वह एक टूटा हुआ कलाकार है जिसे लगता है कि जीवन ने उसके साथ विश्वासघात किया है. जब जीवित रहना ही प्राथमिकता बन जाता है, तो सपने गैर-जिम्मेदार लगने लगते हैं. कहानी अपने भावनात्मक शिखर पर तब पहुंचती है, जब संदीप गायन के जरिए अपनी पहली कमाई करता है और उससे अपने पिता के लिए चश्मा खरीदता है. लेकिन इस स्नेहपूर्ण कदम के जवाब में आभार नहीं, बल्कि गुस्सा मिलता है. दिब्येंदु के अनुसार, यह क्षण अहंकार और पीड़ा के टकराव की त्रासदी को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि कभी-कभी प्रेम मौजूद होता है, लेकिन अहं और पछतावा उससे ज्यादा जोर से बोलते हैं.

घायल हुए दो कलाकारों की कहानी

फिल्म के केंद्रीय विषय पर बात करते हुए अभिनेता ने कहा कि फिल्म दरअसल एक ही दुनिया से घायल हुए दो कलाकारों की कहानी है. उन्होंने कहा, कि यह सवाल उठाती है कि क्या असफलता कला को मार देती है, या कला हमारे भीतर चुपचाप जीवित रहती है. इस लघु फिल्म का निर्देशन अभय चोपड़ा ने किया है और इसका निर्माण शमशाद खान तथा निलेश ननावरे (मैंगो करी फिल्म्स के संस्थापक) और शिवम गुप्ता ने किया है.

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