Gariaband Naxalites: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के नक्सल प्रभावित जंगलों में अब गोलियों की गूंज कम और अपनों की सिसकियों की आवाज़ ज्यादा सुनाई देने वाली है. जिला पुलिस प्रशासन ने जिले से नक्सलवाद की जड़ें उखाड़ने के लिए अब ऑपरेशन प्रहार के बजाय ऑपरेशन संवेदना की ओर रुख किया है. रणनीति साफ है, बंदूक की नोक से नहीं, बल्कि ममता और भरोसे की डोर से नक्सलियों को खींचकर मुख्यधारा में लाना.
कल के कॉमरेड आज बने शांतिदूत
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब 19 जनवरी को सरेंडर कर चुके खूंखार नक्सलियों ने अब अपने बाकी बचे साथियों से घर वापसी की गुहार लगानी शुरू कर दी. DVCM अंजू और बलदेव, जिन्होंने सालों तक जंगल में पुलिस के साथ इस खेल को खेला, अब वे ही पुलिस की नई रणनीति के साथ जुड़कर शांतिदूत बन गए हैं.
अंजू ने अब उन गलियारों में अपनी आवाज़ पहुंचाई है, जहां कभी वह हुकूमत किया करती थी, उसने सीधे तौर पर गोबरा सीता नदी कमेटी के उन 9 सदस्यों को पुकारा है, जो अब भी अंधेरे रास्तों पर भटक रहे हैं.
पुलिस की इस नई रणनीति के केंद्र में उषा (DVCM), ज्योति (DVCM), उमा (ACM), रीना (ACM) और रामदास जैसे बड़े नाम हैं. हाल ही में उषा और बलदेव के परिजनों ने जो भावुक अपील की थी, उसने संगठन के भीतर की दरार को और चौड़ा कर दिया है. इस अपील के बाद महज 24 घंटे के अंदर बलदेव ने सरेंडर कर दिया और 19 जनवरी को सरेंडर करने वाले उनके साथियों का भी कहना है कि बाहर की दुनिया वैसी नहीं है जैसा उन्हें जंगल में डराया जाता था. यहां सम्मान है, सुरक्षा है और सरकार की पुनर्वास नीति का सहारा है.
एसपी ने की है ये अपील
गरियाबंद एसपी ने एक बेहद साहसी कदम उठाते हुए सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की है. बचे हुए नक्सलियों को यह संदेश दिया गया है कि वे किसी भी वक्त सीधे पुलिस कप्तान के मोबाइल नंबर पर संपर्क कर सकते हैं. यह न केवल विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि नक्सलियों के भीतर पनप रहे नेतृत्व के डर को खत्म करने की भी कोशिश है.
गरियाबंद एसपी वेदव्रत सिरमौर का मानना है कि गरियाबंद में सक्रिय यह अंतिम टुकड़ी अगर सरेंडर करती है, तो जिले से नक्सलवाद का लगभग पूरी तरह सफाया हो जाएगा. पुलिस प्रशासन भी चाहता है कि खून की एक भी बूंद बहे बिना यह अंतिम पंक्ति सरेंडर कर दे. प्रशासन का कहना है कि वे हिंसा का अंत चाहते हैं, इंसान का नहीं. हमारा मकसद केवल इलाके को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि उन भटके हुए युवाओं को वापस लाना है जो अपनों से दूर हो गए हैं. पुनर्वास नीति के द्वार सबके लिए खुले हैं.
क्या बचे नक्सली भी करेंगे सरेंडर
अब सवाल यह है कि क्या अंजू की पुकार और परिजनों के आंसू उन 9 नक्सलियों के पत्थरों जैसे मजबूत इरादों को पिघला पाएंगे ? क्या गरियाबंद की मिट्टी अब हमेशा के लिए बारूद की गंध से मुक्त हो जाएगी? आने वाले कुछ दिन गरियाबंद के इतिहास के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं.
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