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बदलते अबूझमाड़ की नई तस्वीर: कभी नक्सली प्लांट करते IED, आज ITBP जवान बना रहे लकड़ी का पुल; मानसून में ग्रामीणों को मिलेगी राहत

नारायणपुर से 65 किमी दूर कुतुल-आदिंगपार-धोबे का 30 किमी मार्ग मानसून में टापू बनने वाला था और 4 सुरक्षा कैंप-15 गांवों का जिला मुख्यालय से संपर्क कट जाता, लेकिन अब यह पुल कनेक्टविटी देगा.

बदलते अबूझमाड़ की नई तस्वीर: कभी नक्सली प्लांट करते IED, आज ITBP जवान बना रहे लकड़ी का पुल; मानसून में ग्रामीणों को मिलेगी राहत
आईटीबीपी के जवानों ने बनाया लकड़ी का पुल.
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31 मार्च 2026 को बस्तर संभाग और खास तौर पर अबूझमाड़ से नक्सलवाद के खात्मे का ऐतिहासिक ऐलान तो कर दिया गया, लेकिन चार दशकों के पिछड़ेपन को एक दिन में दूर करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है. भौगोलिक विषमताएं आज भी अबूझमाड़ के विकास की राह में रोड़ा बनी हुई हैं. नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर कुतुल से आदिंगपार और धोबे तक का इलाका इस मानसून में टापू बनने की कगार पर था, लेकिन बदलते अबूझमाड़ से अब एक ऐसी खूबसूरत और उम्मीद जगाने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के बीच के विश्वास को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है. कल तक नक्सलियों के खौफ में जो ग्रामीण जवानों के खिलाफ मार्ग में आईईडी (IED) प्लांट किया करते थे. आज वही ग्रामीण आईटीबीपी (ITBP) के जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, जंगलों की लकड़ियों से अस्थाई पुलों का निर्माण कर रहे हैं.

नक्सलवाद से मुक्ति के बाद नारायणपुर और अबूझमाड़ के क्षेत्रों में विकास कार्यों को तेज गति देने का प्रयास लगातार जारी है. सुरक्षा के दृष्टिकोण से हर 5 किलोमीटर के दायरे में सुरक्षा कैंप तो स्थापित कर दिए गए हैं और उन्हें कच्ची सड़कों से जोड़ भी दिया गया है, लेकिन मानसून के दस्तक देते ही ये कच्ची सड़कें और इनके बीच बहने वाले नदी-नाले ग्रामीणों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाते हैं.

नारायणपुर के ग्राम कुतुल से आदिंगपार, मदोड़ा और धोबे तक का लगभग 30 किलोमीटर का यह मार्ग इस बारिश में पूरी तरह ठप होने की कगार पर था, जिससे 4 सुरक्षा कैंप और 15 से ज्यादा गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट जाता.

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ग्रामीणों की मदद को आगे आए ITBP जवान

मेडिकल इमरजेंसी, राशन सामग्री और रोजमर्रा की चीजों के लिए बारिश के 4 महीने तक तरसने वाले इन ग्रामीणों की मदद के लिए अब आईटीबीपी की 53वीं वाहिनी के जवान आगे आए हैं. आईटीबीपी के जवानों ने ग्रामीणों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया और स्थानीय स्तर पर जंगलों से मिलने वाली लकड़ियों का उपयोग कर अस्थाई पुल-पुलिया का निर्माण शुरू कर दिया.

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आपात स्थिति से निपटे के लिए कामयाब

ये पुल पक्के तो नहीं हैं, लेकिन आपातकालीन स्थितियों में किसी संजीवनी और जीवन रक्षक से कम नहीं हैं. अब तक इस मार्ग पर अलग-अलग जगहों पर 7 से अधिक पुल तैयार किए जा चुके हैं. यह अनोखी जुगलबंदी बदलते अबूझमाड़ की एक नई और मुकम्मल कहानी बयां करती है. जहां कभी नक्सलियों के खौफ और षड्यंत्र का हिस्सा बनकर ग्रामीण पुलिस के खिलाफ साजिश रचते थे, आज वही ग्रामीण पुलिस सुरक्षा और जन सुविधा कैंपों के माध्यम से शासन की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं और देश के जवानों के साथ मिलकर अपने अबूझमाड़ को संवारने में जुटे हैं.

बेशक ये लकड़ी के पुल अस्थाई हैं, लेकिन इनसे जो ग्रामीणों और सुरक्षा बलों के दिलों के बीच का पुल बना है, वो स्थाई है. यही वजह है कि आज अबूझमाड़ की हवाओं में खौफ नहीं, बल्कि विकास और आपसी सामंजस्य की नई महक है.

संजय कुमार, कमांडेंट (53वीं वाहिनी, आईटीबीपी) ने बताया कि कुतुल से लेकर धोबे मार्ग पर जब हमने सड़क निर्माण का काम आरंभ किया, तब ग्रामीणों का विशेष आग्रह था कि इस मार्ग में पुल का निर्माण होना चाहिए ताकि मानसून की चुनौतियों से निपटा जा सके. ग्रामीणों की मदद और हमारे जवानों के प्रयास से इस मार्ग में अलग-अलग स्थानों पर कुल 825 फीट लंबा और 2 मीटर चौड़ा पुल निर्मित किया जा रहा है. यह पूरी तरह ग्रामीणों को समर्पित है और बारिश के दौरान भी यह पुल गांवों को मुख्य मार्ग से जोड़े रखेगा. हमारा अनुमान है कि इससे लगभग 12 से 13 गांवों को सीधा लाभ पहुंचेगा."

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