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This Article is From Jan 04, 2026

बचपन में मां से बिछड़े 2 बाघों को म‍िली 'आजादी', अब नया ठ‍िकाना सतपुड़ा टाइगर रिजर्व

MP News: नर्मदापुरम के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में आठ महीने की प्रशिक्षण अवधि के बाद दो युवा बाघों को जंगल में मुक्त किया गया. प्रशासन ने उन्हें रेडियो कॉलर पहनाकर निगरानी के लिए तैयार किया.

बचपन में मां से बिछड़े 2 बाघों को म‍िली 'आजादी', अब नया ठ‍िकाना सतपुड़ा टाइगर रिजर्व

MP News: सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (STR) नर्मदापुरम से वन्यजीव संरक्षण की खुशखबरी सामने आई है. आठ महीने तक मानव देखरेख और प्रशिक्षण में रहने के बाद दो युवा बाघों को 2 जनवरी 2026 की शाम को चूरना के घने जंगलों में आज़ाद कर दिया गया. अब ये दोनों बाघ पिंजरे की दीवारों से दूर अपनी प्राकृतिक दुनिया में अपना नया इलाका बनाएंगे.

ये दोनों बाघ मार्च 2025 में रायसेन के भोजपुर क्षेत्र में अपनी मां से बिछड़ गए थे. उस समय इनकी उम्र मात्र 14-15 महीने थी और कम उम्र में मां का साथ छूट जाने के कारण उन्हें शिकार और जंगल में जीवन के महत्वपूर्ण कौशल सीखने का मौका नहीं मिला. वन्यजीव प्रशासन ने इन्हें मालनी बाड़े में रखा और पिछले आठ महीनों में विशेष प्रशिक्षण देकर शिकार करना और जंगल की चुनौतियों का सामना करना सिखाया. अब जब ये पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं, तो उन्हें जंगल में स्वतंत्र जीवन का अवसर दिया गया.

सुरक्षा और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए दोनों बाघों को रेडियो कॉलर लगाया गया है, जिससे उनकी लोकेशन और गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा सकेगी.

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बारे में

सतपुड़ा, जिसका अर्थ संस्कृत में "सात मोड़" या "सात पहाड़ियाँ" है, भारत के सबसे पुराने आरक्षित वनों में से एक है. यह मध्य भारतीय भूभाग में सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के भीतर स्थित है और नर्मदा व ताप्ती नदियों के बीच एक प्राकृतिक जलविभाजक बनाता है. सतपुड़ा का क्षेत्र न केवल मध्य प्रदेश का पहला जैवमंडलीय अभ्यारण्य है, बल्कि यह वनस्पति, जीव-जंतु और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है.

यहाँ साल के वन पठारी भाग में पाए जाते हैं जबकि निचले मैदानी क्षेत्रों में सागौन के वन हैं. इसके अलावा, कुछ ऐसी दुर्लभ प्रजातियाँ भी हैं जो केवल इसी क्षेत्र में देखी जा सकती हैं. सतपुड़ा का यह संरक्षित वातावरण बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करता है. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के संरक्षण प्रयास न केवल प्रजातियों के संरक्षण में मदद करते हैं, बल्कि लोगों में वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास के प्रति जागरूकता भी बढ़ाते हैं.

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