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'हरा सोना' को जमा करने में जुटे श्रमिक, एमपी में तेंदूपत्ता संग्रहण का दिख रहा अलग नजारा

मध्य प्रदेश के सीधी जिले में तेंदूपत्ता संग्रहण का अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है. ‘हरा सोना’ कहे जाने वाले इस पत्ते को जुटाने के लिए पूरा परिवार जंगलों में मेहनत करता है. इससे हजारों ग्रामीणों की आजीविका जुड़ी है और एक सीजन में करोड़ों का भुगतान होता है.

'हरा सोना' को जमा करने में जुटे श्रमिक, एमपी में तेंदूपत्ता संग्रहण का दिख रहा अलग नजारा

Tendu Leaf Collection MP: मध्य प्रदेश में इन दिनों जंगलों के भीतर एक अलग ही हलचल देखने को मिल रही है. ग्रामीण इलाकों में ‘हरा सोना' कहे जाने वाले तेंदूपत्ते के संग्रहण का काम पूरे जोर-शोर से जारी है. सुबह होते ही परिवार के परिवार जंगल की ओर निकल पड़ते हैं. यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि एक तरह का मौसमी उत्सव बन जाता है, जिससे साल भर की कमाई की उम्मीद जुड़ी होती है.

सुबह से शुरू होता है तेंदूपत्ता संग्रहण

सीधी जिले के वन क्षेत्रों में तेंदूपत्ता तोड़ने का काम सुबह से ही शुरू हो जाता है. श्रमिक जंगलों में जाकर पत्तों को सावधानी से तोड़ते हैं और फिर घर ले जाकर उन्हें गड्डी के रूप में तैयार करते हैं. इसके बाद शाम को इन्हें संग्रहण केंद्रों तक पहुंचाया जाता है. इस पूरे काम में पूरा परिवार हिस्सा लेता है.

सीधी जिले में तेंदूपत्ता संग्रहण को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए 51 वनोंपज सहकारी समितियों के तहत 716 संग्रहण केंद्र बनाए गए हैं. यहां इस सीजन में 1 लाख 6 हजार 411 मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसे पूरा करने के लिए तेज़ी से काम चल रहा है.

‘हरा सोना' क्यों कहा जाता है? 

तेंदूपत्ता को ‘हरा सोना' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह ग्रामीणों के लिए आय का बड़ा जरिया है. जंगलों से मिलने वाला यह प्राकृतिक संसाधन साल में कुछ ही दिनों के लिए उपलब्ध होता है, लेकिन इससे होने वाली कमाई पूरे साल के खर्च में मदद करती है.

कमाई का गणित समझिए

तेंदूपत्ता संग्रहण के नियम के अनुसार, 50 पत्तों की एक गड्डी बनाई जाती है. ऐसी 1000 गड्डियों से एक मानक बोरा तैयार होता है. एक मानक बोरे का मूल्य करीब 4 हजार रुपये तय है. इसके अलावा सीजन खत्म होने के बाद बोनस भी मिलता है, जिससे श्रमिकों की आय और बढ़ जाती है.

करोड़ों का होता है भुगतान

बताया जाता है कि तेंदूपत्ता संग्रहण सीजन में श्रमिकों को करीब 46 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया जाता है. पत्तों को तोड़ने के बाद सुखाया जाता है और फिर भंडारण के लिए रखा जाता है. इस पूरी प्रक्रिया से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी होती है.

दूसरे राज्यों तक होती है सप्लाई

सीधी का तेंदूपत्ता सिर्फ स्थानीय उपयोग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश के कई राज्यों तक भेजा जाता है. केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इसकी सप्लाई होती है. हर साल अलग-अलग ठेकेदार इसकी खरीद के लिए बोली लगाते हैं.

परिवार के लिए बनता है कमाई का जरिया

ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए तेंदूपत्ता संग्रहण किसी त्योहार से कम नहीं होता. करीब एक हफ्ते से 10 दिन तक चलने वाले इस काम में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी शामिल होते हैं. एक परिवार अक्सर 5 से 8 मानक बोरा तक पत्ते इकट्ठा कर लेता है, जिससे अच्छी आमदनी हो जाती है.

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