मध्यप्रदेश में डॉक्टर बनना और महंगा ! निजी मेडिकल कॉलेज में फीस बढ़कर 63 लाख से ज्यादा, बाकी खर्चे अलग से

Professional Courses Fee Hike in Madhya Pradesh: प्रोफेशनल कोर्सों में दाखिले के लिए छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा पास करना एक चुनौती है, लेकिन असली परीक्षा अब फीस की पर्ची बन गई है. एमबीबीएस 12.60 लाख सालाना, आयुर्वेद 6 लाख तक, एमबीए 1.90 लाख, बीई 1.44 लाख, एलएलबी 98 हजार उच्च शिक्षा अब ‘लाखों का खेल’ बन चुकी है.

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Professional Educstion Fee Hike: मध्य प्रदेश में प्रोफेशनल शिक्षा की फीस को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. साल 2025 में प्रवेश और शुल्क विनियामक समिति ने सिर्फ 14 बैठकों में 1,437 संस्थानों की फीस तय कर दी. इससे जुड़े आंकड़े बहुत ही चौंकाने वाले हैं. दरअसल, 20 मई 2025 की बैठक में अकेले 370 संस्थानों की फीस निर्धारित कर दी गई. वहीं, 17 जून को 293, 15 जून को 244, 9 जून को 224 और 10 दिसंबर 2025 को 178 संस्थानों की फीस पर मुहर लगाई गई. यह जानकारी उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी है.

सबसे बड़ा झटका मेडिकल शिक्षा को लेकर सामने आया है. एमबीबीएस की वार्षिक फीस 2025-26 के लिए न्यूनतम 9 लाख रुपये और अधिकतम 12 लाख 60 हजार रुपये तय की गई है. यानी पांच साल की पढ़ाई में केवल ट्यूशन फीस ही 60 लाख रुपये से अधिक हो सकती है. इसमें हॉस्टल, किताबें, उपकरण, परीक्षा शुल्क और अन्य खर्च शामिल नहीं हैं. यानी डॉक्टर बनने का सपना अब सिर्फ मेधा का नहीं, बल्कि आर्थिक सामर्थ्य का भी इम्तिहान बनता दिख रहा है.

फीस का महाभूकंप: 14 बैठकों में 1,437 संस्थानों की फीस तय, MBBS 12.60 लाख सालाना तक पहुंची
Photo Credit: AI Generated Image

आयुर्वेदिक मेडिकल शिक्षा भी लाखों में पहुंच 

आयुर्वेदिक मेडिकल शिक्षा भी अब लाखों में पहुंच चुकी है. एमडी (आयुर्वेदिक) नॉन-क्लिनिकल की फीस न्यूनतम लगभग 1.91 लाख रुपये और अधिकतम 6 लाख रुपये तक की गई है. बीएएमएस की फीस भी 2.20 लाख से 6 लाख रुपये सालाना के बीच तय की गई है. बीडीएस में भी स्थिति अलग नहीं है. यहां भी फीस 2.60 लाख से 6 लाख रुपये तक जाती है. यानी आधुनिक हो या पारंपरिक चिकित्सा, डॉक्टर बनने की कीमत अब करोड़ों के सपनों जैसी लगने लगी है.

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तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा भी हुई महंगी 

सिर्फ मेडिकल ही नहीं, तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा भी तेजी से महंगी हुई है. 2017-18 से 2025-26 के बीच न्यूनतम फीस में जहां 8 से 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वहीं, अधिकतम फीस में 80 से 120 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया गया. 2025-26 में एमबीए की न्यूनतम फीस 40 हजार रुपये और अधिकतम 1.90 लाख रुपये है. बीई (इंजीनियरिंग) और अन्य तकनीकी पाठ्यक्रमों में न्यूनतम लगभग 42 हजार और अधिकतम 1.44 लाख रुपये तक फीस तय की गई है. यानी कई कोर्सों में 2024-25 की तुलना में 2025-26 में अधिकतम फीस में 20 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी कर दी गई है. 

वकील बनना भी नहीं होगा आसान

कानून की पढ़ाई भी सस्ती नहीं रही. एलएलबी की फीस 23 हजार से 98 हजार रुपये तक है, जबकि एलएलएम की फीस 25 हजार से 82 हजार रुपये के बीच है. बीएड की फीस 2017-18 में जहां लगभग 82 हजार रुपये थी. वह 2024-25 तक बढ़कर 1.19 लाख रुपये से अधिक हो चुकी है. फिजियोथेरेपी कोर्स एमपीटी और बीपीटी की फीस भी अब हजारों से निकलकर लाखों में जा पहुंची है.

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मंत्री ने फीस वृद्धि को बताया सही

मंत्री इंदर सिंह परमार ने फीस में अंतर को संस्थानों की आय-व्यय विवरणी के आधार पर उचित बताया. उनका कहना है कि फीस निर्धारण में वेतन मद प्रमुख है, इसलिए जहां खर्च अधिक है, वहां फीस भी अधिक होगी.

कांग्रेस ने लगाया मनमानी का आरोप

हालांकि, कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि जब पाठ्यक्रम के मानदंड, फैकल्टी की योग्यता और वेतन संरचना केंद्र और राज्य सरकार तय करते हैं, तो एक ही कोर्स की फीस में चार से पांच गुना तक का अंतर कैसे हो सकता है? समिति की बैठक की कार्यवाही में केवल संस्थान का नाम और तय की गई फीस दर्ज है, यह नहीं बताया गया कि किस मद में खर्च बढ़ा या किस सरकारी निर्देश के आधार पर फीस बढ़ाई गई. ग्रेवाल का आरोप है कि समिति के नियमों में स्पष्ट लिखा है कि छात्रों से भवन निर्माण, विकास कार्य, पूंजी निवेश या ब्याज जैसे मदों का शुल्क नहीं लिया जाएगा. फीस बढ़ाने से पहले समिति या उसके प्रतिनिधियों को संस्थान का भौतिक सत्यापन करना चाहिए, लेकिन बैठक विवरण में ऐसी किसी जांच का उल्लेख नहीं है.

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फीस बढ़ाने के लिए नियमों का नहीं हुआ पालन

कांग्रेस विधायक ने यह भी दावा किया कि 20 मई 2025 की बैठक के अंत में समिति ने स्वयं सुझाव दिया था कि फैकल्टी के वेतन सत्यापन के लिए आयकर विभाग द्वारा काटे गए टीडीएस का प्रमाण लिया जाए, ताकि वेतन के नाम पर अनियमितता न हो. लेकिन बाद की बैठकों में 1,000 से अधिक संस्थानों की फीस बढ़ाते समय इस शर्त का पालन नहीं किया गया. ग्रेवाल ने आरोप लगाया कि फीस वृद्धि के जरिए हर साल 400 से 500 करोड़ रुपये तक की अनियमितता हो रही है. 

सरकार ने साधी चुप्पी

हालांकि, सरकार ने इन आरोपों पर सीधे तौर पर प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन 14 बैठकों में 1,437 संस्थानों की फीस तय करने की रफ्तार ने पारदर्शिता को लेकर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं.

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इन कोर्सों दाखिले के लिए छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा पास करना एक चुनौती है, लेकिन असली परीक्षा अब फीस की पर्ची बन गई है. एमबीबीएस 12.60 लाख सालाना, आयुर्वेद 6 लाख तक, एमबीए 1.90 लाख, बीई 1.44 लाख, एलएलबी 98 हजार उच्च शिक्षा अब ‘लाखों का खेल' बन चुकी है.

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