Drinking Water Crisis: मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है. इस कहावत को मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक साधारण से मजदूर ने सच कर दिखाया है. जब सरकारी सिस्टम ने आंखें मूंद लीं और समाज ने ताने दिए, तो उस शख्स ने किसी बैशाखी का इंतजार नहीं किया. अपनी मेहनत, कुदाल और फौलादी इरादों के दम पर उसने जमीन का सीना चीरकर पानी निकाल दिया.
यह अविश्वसनीय कहानी सागर जिले की नारियाबली विधानसभा क्षेत्र के ग्राम इमलिया के रहने वाले 71 वर्षीय अजब सिंह आदिवासी किसान की है. आज उन्हें पूरा जिला बेहद सम्मान के साथ “सागर का दशरथ मांझी” कहता है.
रिश्वतखोर व्यवस्था ने तोड़ दिया था भरोसा
यह कहानी शुरू होती है 90 के दशक में, जब इमलिया गांव पानी की भयंकर किल्लत से जूझ रहा था. गर्मियों में हालात बदतर हो जाते थे और ग्रामीणों को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ता था. उस समय सरकार की ओर से कुआं खुदवाने के लिए आर्थिक मदद मिलती थी. अजब सिंह भी इसी उम्मीद के साथ कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे कि शायद सरकार उनकी सुन लेगी. लेकिन, वहां मदद के बदले उनसे पांच हजार रुपए की रिश्वत मांगी गई. एक गरीब मजदूर के लिए यह रकम किसी पहाड़ जैसी थी. निराश और लाचार अजब सिंह बिना सरकारी सहायता के वापस लौट आए, लेकिन व्यवस्था का यह रवैया उनके दिल में चुभ गया.
अपमान और दूषित पानी ने पैदा की 'जिद'
सरकारी दफ्तर से खाली हाथ लौटने के बाद अजब सिंह का परिवार दूर के एक पुराने कुएं से पानी लाने को मजबूर था. इसी बीच, एक दिन पानी भरने के दौरान कुछ लोगों ने उनकी पत्नी सदा रानी के साथ दुर्व्यवहार किया. इस घटना ने अजब सिंह को अंदर तक झझकोर दिया. दूसरी तरफ, दूषित पानी पीने की वजह से उनका परिवार लगातार बीमार पड़ रहा था. अजब सिंह बताते हैं कि जब मैंने अपने बच्चों और पत्नी को गंदा पानी पीते और बीमार होते देखा, तो मुझसे रहा नहीं गया. उसी पल मैंने ठान लिया कि अब किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगा, अपना कुआं खुद खोदकर रहूंगा.
दिन में मजदूरी, रात में खुदाई
अजब सिंह के पास न तो आधुनिक मशीनें थीं और न ही मजदूरों को देने के लिए पैसे. उन्होंने अकेले ही फावड़ा और गैंती उठाई और काम पर लग गए. उनका शेड्यूल बेहद थका देने वाला था. दिन में वह परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी करते और रात के सन्नाटे में टॉर्च की रोशनी में कुआं खोदते. यह रास्ता आसान नहीं था. खुदाई के दौरान भारी चट्टानें आईं, कई बार मिट्टी धंसने से जान का खतरा बना और कई रातें ऐसी भी आईं जब पूरे परिवार को भूखे पेट सोना पड़ा. लेकिन अजब सिंह का हौसला नहीं डगमगाया. लगातार दो साल की हाड़तोड़ मेहनत के बाद उन्होंने करीब 50 फीट गहरा कुआं तैयार कर दिया.
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जब अजब सिंह ने अकेले खुदाई शुरू की थी, तब गांव के लोग उन पर हंसते थे. लोग उन्हें 'पागल' कहते थे और ताना मारते थे कि अकेला आदमी कभी कुआं नहीं खोद सकता, लेकिन आज वक्त बदल चुका है. गर्मियों के दिनों में जब गांव के अन्य जल स्रोत सूख जाते हैं, तब अजब सिंह का यह कुआं पूरे गांव की प्यास बुझाता है. जो लोग कभी ताने मारते थे, आज वे इस 'आधुनिक भगीरथ' की तारीफ करते नहीं थकते. ग्रामीणों का कहना है कि अजब सिंह ने साबित कर दिया कि अगर इंसान के इरादे मजबूत हों, तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी इतिहास रच सकता है.
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