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पत्नी की याद में कविता सुनाकर दुनिया छोड़ गए कवि! VIDEO में सुनें वो आखिरी पंक्तियां

निवाड़ी जिले के पृथ्वीपुर में काव्य गोष्ठी के दौरान वरिष्ठ कवि सत्यप्रकाश खरे ‘सत्य-सुधा’ ने अपनी स्वर्गीय पत्नी ‘सुधा’ को समर्पित कविता सुनाई और कुछ ही मिनट बाद उनकी सांसें थम गईं. बचपन और प्रेम पर आधारित पंक्तियों के बाद सभागार तालियों से गूंज उठा, मगर देखते ही देखते कार्यक्रम शोकसभा में बदल गया.

पत्नी की याद में कविता सुनाकर दुनिया छोड़ गए कवि! VIDEO में सुनें वो आखिरी पंक्तियां

Poet Dies During Poetry Recital: मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के पृथ्वीपुर में एक सादगीपूर्ण काव्य संध्या भावुक शोकसभा में बदल गई, जब वरिष्ठ कवि सत्यप्रकाश खरे ‘सत्य-सुधा' ने अपनी स्वर्गीय पत्नी को समर्पित कविता सुनाने के कुछ ही मिनट बाद मंच से लौटकर सीट पर बैठते हुए अंतिम सांस ली. उस पल सभागार में मौजूद लोग स्तब्ध रह गए, कविता की गूंज के बाद छा गई गहरी खामोशी ने सबको भीतर तक हिला दिया.

काव्य संध्या में भावुक पल

निवाड़ी जिले के पृथ्वीपुर में 14 जनवरी की शाम साहित्यप्रेमियों की एक सादा काव्य गोष्ठी चल रही थी. इसी दौरान टीकमगढ़ के प्रतिष्ठित कवि सत्यप्रकाश खरे ‘सत्य-सुधा' मंच पर आए. वे अपनी विनम्रता, सहजता और पारिवारिक साहित्यिक विरासत के लिए जाने जाते थे. उनकी मौजूदगी से माहौल और भी आत्मीय हो गया.

पत्नी सुधा की कविताएं पढ़ बने कवि

टीकमगढ़ के पत्रकार अनुराग दीक्षित के अनुसार, सुधा कवियित्री और सरकारी शिक्षिका थीं. 2023 में कोरोना काल में वे बीमार पड़ीं. सत्यप्रकाश ने इलाज पर बहुत खर्च किया, लेकिन उन्हें बचा न सके. इसके बाद वे भीतर से टूट गए. वे सुधा की कविताएं मंचों पर पढ़ने लगे और धीरे-धीरे खुद भी कवि बन गए. उनकी कविताओं का आधार सुधा के प्रति प्रेम ही रहा और उसी प्रेम के शब्दों में वे दुनिया से विदा हो गए.

बचपन की यादों से शुरुआत

सत्यप्रकाश ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत बचपन की मासूमियत पर आधारित पंक्तियों से की...
“कितना प्यार, कितना सुंदर था वो मेरा बचपन… वर्षा ऋतु तो होती हम बच्चों की सबसे प्यारी… कागज की हम नाव चलाते…”
इन पंक्तियों ने श्रोताओं को उनके अपने बचपन की यादों में पहुंचा दिया. सभागार में तालियां गूंजीं और माहौल भावुक हो उठा.

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‘सुधा' को समर्पित आखिरी कविता

इसके बाद उन्होंने अपनी स्वर्गीय पत्नी सुधा के नाम एक कविता सुनाई, जिनका निधन 2023 में हो गया था. 
“चांदनी रात में, चांद के साथ में… मन मृदुल गात में, मय ‘सुधा' साथ में…”
ये कविता खत्म हुई, लोग खड़े होकर ताली बजाने लगे. वे मुस्कुराए, माइक से हटकर अपनी कुर्सी पर लौटे और दो मिनट बाद अचानक झुक गए. लोगों ने दौड़कर संभाला, पर प्रारंभिक रूप से हृदयघात की आशंका जताई गई. उसी क्षण काव्य गोष्ठी शोकसभा में बदल गई.

साहित्य जगत में शोक की लहर

टीकमगढ़ और निवाड़ी के साहित्यिक व सामाजिक वर्ग में गहरा शोक है. हर किसी की जुबान पर एक ही बात कि “वे कविता बनकर आए और कविता में ही विलीन हो गए. कवि नहीं गए, शब्द बनकर रह गए.” उनकी अंतिम प्रस्तुति ने यह भरोसा स्थायी बना दिया कि सच्ची कविता जीवन से आगे भी सांस लेती है.

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