मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल का नर्मदा जल विवाद में दखल देने के लिए आभार व्यक्त किया. यह विवाद दशकों पुराना था. सीएम मोहन यादव ने कहा कि मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद में फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय के बाद एक समाधान निकला. यह राय पुनर्वास की लागत को बांटने के बारे में थी.
इससे पहले मध्य प्रदेश पर लगभग 1,500 करोड़ रुपये का बोझ था. नई दिल्ली में मंगलवार को हुई बैठक के बाद, यह तय किया गया कि गुजरात 50 प्रतिशत के बजाय 75 प्रतिशत लागत उठाएगा, जिससे मध्य प्रदेश का हिस्सा घटकर 217 करोड़ रुपये रह जाएगा.
दशकों तक अनसुलझे रहे विवाद
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप ने बताया कि सीएम यादव ने मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान ये जानकारी दी. नर्मदा पर बना सरदार सरोवर बांध गुजरात में स्थित है, लेकिन इसके जलाशय से ऊपर की ओर स्थित राज्यों महाराष्ट्र, एमपी में जमीन डूब जाती है, इसलिए नदी के फायदों और लागत को बांटने के लिए नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था. 1979 में न्यायाधिकरण के फैसले के बावजूद लागत-बंटवारे की व्यवस्था, पुनर्वास खर्च और राज्यों के बीच मुआवजे को लेकर विवाद दशकों तक अनसुलझे रहे.
आखिरकार केंद्रीय मंत्रालय की मध्यस्थता से इस मुद्दे को सुलझा लिया गया. मुख्य विवाद जमीन अधिग्रहण, निर्माण के लिए लिए गए कर्ज, पुनर्वास और बसावट पर होने वाली भारी लागत को बांटने पर केंद्रित था.
क्या है अंतिम समझौते में
अंतिम समझौते के तहत पुराने बकाया को काफी हद तक माफ कर दिया गया है या फिर से व्यवस्थित किया गया है, ताकि एक व्यापक समाधान हो सके. मध्य प्रदेश ने बांध परियोजना से डूबने के असर के लिए ऐतिहासिक रूप से लगभग 7,669 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी.
अंतिम समझौते के तहत, मध्य प्रदेश सरकार सभी लंबित आपसी दायित्वों को निपटाने के लिए गुजरात को एकमुश्त 217 करोड़ रुपये का भुगतान करेगी. परियोजना से सिंचाई और पीने के पानी का मुख्य लाभार्थी होने के नाते गुजरात ने सबसे बड़ा वित्तीय बोझ उठाया और अब वह विवाद से जुड़े किसी भी लंबित मुकदमे के बिना आगे बढ़ सकता है.
राजस्थान, जिसे नर्मदा के पानी से सिंचाई और कृषि विकास का भी लाभ मिला, उसने भी व्यापक समझौते के तहत लागत-बंटवारे के अपने दायित्वों को निपटा लिया है. 1979 के मूल नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के अनुसार, गुजरात को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे ऊपर की ओर स्थित राज्यों में पुनर्वास और बसावट और जमीन अधिग्रहण पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा उठाना था.
साल 1969 से चला आ रहा है विवाद
नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात से होती हुई अरब सागर में मिलती है. नदी पर सरदार सरोवर सहित कई बड़ी सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाएं बनाई गईं. इन परियोजनाओं से मिलने वाले पानी के बंटवारे, बांध निर्माण की लागत और पुनर्वास को लेकर मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय तक विवाद चलता रहा.
इसी विवाद को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का गठन किया गया. करीब 10 साल तक सुनवाई चली और 1979 में न्यायाधिकरण ने अपना अंतिम फैसला सुनाया. न्यायाधिकरण ने उपयोग योग्य 28 मिलियन एकड़ फीट पानी का चारों राज्यों में बंटवारा किया. राजस्थान का हिस्सा केवल 0.50 एमएएफ तय किया गया. यह पानी गुजरात के सरदार सरोवर बांध से नर्मदा मुख्य नहर के जरिए राजस्थान तक पहुंचता है. इसके अलावा मध्य प्रदेश का 18.25, गुजरात का 9 और महाराष्ट्र का 0.25 एमएएफ हिस्सा तय किया गया.
प्रोजेक्ट पर खर्च को लेकर राज्यों के दावों से विवाद
1979 में पानी का हिस्सा तय हो गया था, लेकिन सरदार सरोवर परियोजना के निर्माण की लागत, भूमि अधिग्रहण, डूब क्षेत्र, पुनर्वास, सरकारी परिसंपत्तियों और अन्य खर्चों को लेकर राज्यों के बीच वित्तीय विवाद चलता रहा. परियोजना की लागत लगातार बढ़ती गई. गुजरात सरकार का तर्क था कि उसने परियोजना पर अधिक खर्च किया है, इसलिए अन्य राज्यों को अपनी लागत हिस्सेदारी का भुगतान करना चाहिए. दूसरी ओर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र ने भी अपने खर्चों का दावा किया. राजस्थान की लागत हिस्सेदारी भी वर्षों तक लंबित रही. यही विवाद धीरे-धीरे अदालतों तक पहुंच गया और लगभग 5 दशक बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका.
गुजरात ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान पर कुल करीब 7,974.86 करोड़ रुपये का दावा किया था. इसमें राजस्थान पर लगभग 574.52 करोड़ रुपये की देनदारी बताई गई. मध्य प्रदेश ने गुजरात पर करीब 7,669 करोड़ रुपये का दावा किया, जबकि महाराष्ट्र ने लगभग 3,000 करोड़ रुपये की मांग रखी. राजस्थान की ओर से सरदार सरोवर परियोजना में लागत साझेदारी के तहत लगभग 556 करोड़ रुपये का मामला लंबित था.