Kuno National Park: मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अत्यंत दुर्लभ और लुप्तप्राय ‘फॉरेस्ट आउलेट' Forest Owlet (वन उल्लू) का दिखना पक्षी-विज्ञान और संरक्षण जगत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. यह महत्वपूर्ण खोज उस समय सामने आई है जब अफ्रीका से चीतों के तीसरे समूह को कूनो लाए जाने की तैयारियां जारी हैं. विभाग के अनुसार, दक्षिणी अफ्रीका के बोत्सवाना से आठ चीते शनिवार को कूनो पहुंचेंगे. यह कदम भारत में लगभग सात दशक बाद चीतों को पुनः बसाने की महत्वाकांक्षी परियोजना का हिस्सा है.
फॉरेस्ट आउलेट: दुनिया के सबसे दुर्लभ शिकारी पक्षियों में शामिल
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) सुभरंजन सेन ने बताया कि ‘फॉरेस्ट आउलेट' विश्व के सबसे दुर्लभ शिकारी पक्षियों में से एक है. उन्होंने कहा, “यह पक्षी-विज्ञान के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है. संकटग्रस्त ‘फॉरेस्ट आउलेट' पहली बार कूनो राष्ट्रीय उद्यान में प्रमाणित रूप से दर्ज किया गया है.”
चीता संरक्षण के प्रभाव से पक्षियों के लिए भी बेहतर हुआ आवास
सेन ने बताया कि इस प्रजाति का कूनो में दिखना इस बात का संकेत है कि चीता संरक्षण कार्यक्रम के बाद उद्यान का पारिस्थितिक संतुलन बेहतर हुआ है. उनके अनुसार “चीतों के संरक्षण प्रयास केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार में सहायक सिद्ध हो रहे हैं.”
स्थानीय पर्यटन संचालक ने देखी पहली झलक
यह दुर्लभ पक्षी कूनो के परोंद बीट में नियमित भ्रमण के दौरान स्थानीय पर्यटन संचालक लाभ यादव को दिखाई दिया. विभाग ने तुरंत इसकी गंभीरता से जांच की. पुणे स्थित वाइल्डलाइफ रिसर्च एंड कंजर्वेशन सोसाइटी के विवेक पटेल ने मौके पर पहुंचकर पहचान की पुष्टि की. इसके साथ ही यह कूनो में ‘फॉरेस्ट आउलेट' का पहला आधिकारिक रिकॉर्ड बन गया.
दिन में सक्रिय रहने वाला दुर्लभ उल्लू
अधिकारी बताते हैं कि अधिकांश उल्लुओं के विपरीत ‘फॉरेस्ट आउलेट' दिन में सक्रिय होता है. यह सुबह 6 से 10 बजे के बीच अधिक दिखाई देता है और तेज धूप में भी ऊंचे वृक्षों की टहनियों पर देखा जा सकता है.
1872 में मिला पहला वैज्ञानिक विवरण, 1997 में पुनः खोज
फॉरेस्ट आउलेट का पहला वैज्ञानिक वर्णन 1872 में हुआ था, लेकिन 1884 के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया.
फिर 113 साल बाद, वर्ष 1997 में महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में इसे पुनः देखा गया, जिसने अंतरराष्ट्रीय पक्षी-विज्ञान जगत में हलचल मचा दी थी.
मध्य भारत के सीमित हिस्सों में ही मिलती है प्रजाति
वर्तमान में यह प्रजाति मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ विखंडित वन क्षेत्रों में पाई जाती है. मध्यप्रदेश में पहले इसका रिकॉर्ड केवल खंडवा, बुरहानपुर और बैतूल जिलों में था. कूनो में मिला यह नया रिकॉर्ड राज्य के जैव-विविधता मानचित्र पर महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है.
आईयूसीएन ने ‘लुप्तप्राय' श्रेणी में रखा
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने ‘फॉरेस्ट आउलेट' को ‘लुप्तप्राय' श्रेणी में शामिल किया है. इसकी वैश्विक वयस्क आबादी मात्र 250 से 999 के बीच आंकी गई है. अधिकारियों का कहना है कि मध्यप्रदेश में इसके वर्तमान वितरण को समझने के लिए और विस्तृत सर्वेक्षण जरूरी हैं.
कूनो में दिखना सकारात्मक संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि इस दुर्लभ प्रजाति का कूनो में दर्ज होना बताता है कि क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो रहा है. चीतों की वापसी के साथ-साथ अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों की मौजूदगी में बढ़ोतरी पर्यावरण संरक्षण के व्यापक प्रभावों का संकेत है.
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