विज्ञापन

इंदौर में फिर दिखा पोहा प्रेम: फॉर्च्यून फूड्स-रेडियो मिर्ची के आयोजन में उमड़ा शहर

इंदौर में  फॉर्च्यून फूड्स और रेडियो मिर्ची द्वारा आयोज‍ित वर्ल्ड पोहा डे कार्यक्रम के जर‍िए गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने का एक विशेष प्रयास भी किया गया.

इंदौर में फिर दिखा पोहा प्रेम: फॉर्च्यून फूड्स-रेडियो मिर्ची के आयोजन में उमड़ा शहर
पोहा इंदौर की पहचान और उसकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है.
ians

पोहा सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि इंदौर की रग-रग में बसा उसकी संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा है. इंदौर के इसी पोहा प्रेम को एक नए मुकाम पर ले जाते हुए फॉर्च्यून फूड्स ने रेडियो मिर्ची के साथ मिलकर हाल ही विश्व पोहा दिवस के मौके पर एक भव्य और यादगार कार्यक्रम का आयोजन किया. इस अनूठे उत्सव में इंदौर शहर के कोने-कोने से सैकड़ों पोहा प्रेमी एकजुट हुए.

गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने की कोशिश

इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में नाम दर्ज कराने का एक विशेष प्रयास किया गया इसके अलावा, आयोजन में सामूहिक व्यायाम, विभिन्न कम्युनिटीज़ की भागीदारी और सोशल मीडिया क्रिएटर्स के जुड़ाव ने इसे बेहद रोमांचक बना दिया. फिटनेस और स्वाद के इस अनूठे संगम ने इंदौर की सामुदायिक भावना को और मजबूत किया.

इंदौर में पोहा का शानदार इत‍िहास

इंदौर के खान-पान की जब भी बात होती है, तो सबसे पहला नाम 'पोहा-जलेबी' का आता है. आज पोहा इंदौर की पहचान और उसकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इंदौर में इसके आने और यहां की कमजोरी बनने का इतिहास बेहद दिलचस्प है. आइए जानते हैं कि कैसे महाराष्ट्र का यह साधारण सा व्यंजन इंदौर की शान बन गया?

1. होल्कर राजवंश और मराठा कनेक्शन

इंदौर में पोहे के आगमन का श्रेय मराठा शासकों (होल्कर राजवंश) को जाता है. पोहे की शुरुआत मूल रूप से महाराष्ट्र में हुई थी, लेकिन मराठा शासक जब 18वीं सदी में मध्य प्रदेश आए, तो वे अपने साथ इस स्वादिष्ट व्यंजन को भी मालवा (इंदौर) ले आए. जब मराठाओं ने मालवा क्षेत्र पर अपना शासन स्थापित किया, तो वे अपने साथ महाराष्ट्र की संस्कृति और खान-पान भी लेकर आए. महाराष्ट्र में पोहा (वहां का कांदा पोहा) पहले से ही चाव से खाया जाता था. होल्कर राजाओं के दौर में यह व्यंजन इंदौर के शाही घरानों और मराठी परिवारों की रसोई तक पहुंचा. 

2. पुरुषोत्तम जोशी: इंदौर को पोहा का चस्का लगाने वाले शख्स

भले ही पोहा मराठाओं के साथ आया, लेकिन इसे इंदौर की सड़कों पर आम जनता का पसंदीदा नाश्ता बनाने का श्रेय पुरुषोत्तम जोशी को जाता है. 1949 की शुरुआत में पुरुषोत्तम जोशी महाराष्ट्र के रायगढ़ से इंदौर आए थे. उन्होंने इंदौर के रीगल टॉकीज के सामने एक छोटी सी दुकान (जो बाद में 'प्रशांत पोहा' के नाम से मशहूर हुई) शुरू की. उन्होंने महाराष्ट्र के पारंपरिक पोहे में थोड़ा बदलाव किया. उन्होंने इसे इंदौर के लोगों के स्वाद के अनुकूल बनाया और देखते ही देखते यह इंदौरियों का सबसे पसंदीदा सुबह का नाश्ता बन गया.

3. मराठी पोहा से  इंदौरी पोहा बनने का सफर

इंदौर ने पोहे को सिर्फ अपनाया नहीं, बल्कि उसका पूरी तरह से कायाकल्प कर दिया. महाराष्ट्र के 'कांदा-बटाटा पोहा' और 'इंदौरी पोहा' में कुछ मुख्य अंतर हैं जिन्होंने इसे खास बनाया. इंदौर में पोहे को सीधे कढ़ाई में बनाने के बजाय भाप पर पकाया जाता है. इससे पोहा बेहद हल्का, खिला-खिला और लंबे समय तक नरम रहता है. यह इंदौरी पोहे की असली जान है. इस खास मसाले के बिना इंदौरी पोहा अधूरा है. पोहे के ऊपर कटी हुई प्याज, तीखी इंदौरी सेव, अनार के दाने और सूखा धनिया डाला जाता है.

यह भी पढ़ें- Sonal Chauhan Exclusive: 'मैंने भोपाल का पोहा खाया, यहां पहाड़ों वाली फीलिंग आती है..'

पूरी स्टोरी पढ़ें

MPCG.NDTV.in पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें. देश और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं. इसके अलावा, मनोरंजन की दुनिया हो, या क्रिकेट का खुमार,लाइफ़स्टाइल टिप्स हों,या अनोखी-अनूठी ऑफ़बीट ख़बरें,सब मिलेगा यहां-ढेरों फोटो स्टोरी और वीडियो के साथ.

फॉलो करे:
Close