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38 डिग्री गर्मी में बीमार बेटे का स्ट्रेचर धकेलते रहे माता-पिता, MY अस्पताल से सामने आई बड़ी लापरवाही

धूप में बच्चे को ले जाते माता-पिता ने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जाने के लिए पर्ची थमा दी, लेकिन मरीज को वहां तक पहुंचाने के लिए कोई कर्मचारी या स्ट्रेचर सहायता नहीं मिली. इसलिए इस तरह से ले जा रहे हैं.

38 डिग्री गर्मी में बीमार बेटे का स्ट्रेचर धकेलते रहे माता-पिता, MY अस्पताल से सामने आई बड़ी लापरवाही
बच्चे को स्ट्रेचर पर लेकर एक अस्पताल दूसरे तक चक्कर काटते माता पिता.
Bharat Patil

MP Hospital Indore: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर (Indore) स्थित एमवाय अस्पताल की व्यवस्थाओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. दरअसल, शनिवार दोपहर करीब ढाई बजे 38-40 डिग्री तापमान में एक दंपति एक किलो मीटर तक अपने 5 साल के बीमार बेटे को स्ट्रेचर पर खुद धकेलते हुए एमवाय अस्पताल से सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तक ले जाने को मजबूर दिखाई दिए.

रीढ़ की गंभीर बीमारी से जूझ रहे 5 वर्षीय आदर्श का इलाज एमवाय अस्पताल में चल रहा है. परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने उन्हें सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जाने के लिए पर्ची थमा दी, लेकिन मरीज को वहां तक पहुंचाने के लिए कोई कर्मचारी या स्ट्रेचर सहायता नहीं मिली. मजबूरी में पिता गोलू खुद तेज धूप में स्ट्रेचर धकेलते रहे, जबकि मां ज्योति बार-बार अपना दुपट्टा पानी से भिगोकर बेटे को गर्मी से बचाने की कोशिश करती रही.

एक अस्पताल से दूसरे तक काटना पड़ा चक्कर

परिजनों की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई. सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल पहुंचने और तीसरी मंजिल तक जाने के बाद डॉक्टरों ने बताया कि मरीज को लाने की जरूरत ही नहीं थी, केवल दस्तावेज दिखाने थे. इसके बाद लाचार माता-पिता को अपने बेटे को फिर वापस एमवाय अस्पताल लेकर जाना पड़ा.

सुविधा है, पर सिस्टम नहीं है

हैरानी की बात यह है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज परिसर में कई बड़े अस्पताल संचालित हैं और परिसर में एम्बुलेंस भी मौजूद हैं, लेकिन मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है.

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वहीं, इस मामले के उजागर होने पर जिम्मेदार अधिकारी अब जांच कर व्यवस्था सुधारने की बात कह रहे हैं. ऐसा नहीं कि इस तरह की यहां कोई पहली घटना घटी हो, बल्कि इससे पहले भी इसी तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन हालात नहीं बदले. अब एक बार फिर जांच करने और व्यवस्था सुधारने की बातें कही जा रही है. अब सवाल यह है कि आखिर मरीजों और उनके परिजनों को कब तक इस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?

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