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This Article is From Mar 16, 2026

Dhar Bhojshala Dispute : मुस्लिम पक्ष ने धार में दायर किया दीवानी मुकदमा, पूरे परिसर पर जताया मालिकाना हक, दी ये बड़ी दलील

Kamal Maula Mosque: मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने बताया कि हमने धार की एक दीवानी अदालत में पिछले हफ्ते दायर मुकदमे में कहा है कि समूचा विवादित परिसर वक्फ (धर्मार्थ अर्पित संपत्ति) की पंजीकृत मिल्कियत है, जिसे मूलत: जामा मस्जिद के नाम से जाना जाता है. उन्होंने कहा कि मुकदमे में मध्य प्रदेश के राजपत्र और राजस्व रिकॉर्ड के साथ ही एएसआई के ‘वैध कानूनी दस्तावेज' पेश किए गए हैं और पूरे विवादित परिसर पर मुस्लिम पक्ष के मालिकाना हक का दावा किया गया है.

Dhar Bhojshala Dispute :  मुस्लिम पक्ष ने धार में दायर किया दीवानी मुकदमा, पूरे परिसर पर जताया मालिकाना हक, दी ये बड़ी दलील

Bhojshala-Kamal Maula Mosque Dispute: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर जारी कानूनी विवाद में नया मोड़ आ गया है. मुस्लिम पक्ष ने धार की एक अदालत में दीवानी मुकदमा दायर करते हुए समूचे विवादित परिसर को ‘वक्फ संपत्ति' बताते हुए इस पर अपने मालिकाना हक का दावा किया है.

यह मुकदमा ऐसे वक्त दायर किया गया है, जब इस विवादित स्मारक को लेकर दायर अलग-अलग याचिकाएं मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित हैं और हिंदू पक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर दावा कर रहा है कि यह परिसर मूलत: एक प्राचीन मंदिर है. 

मुस्लिम पक्ष ने दी ये दलील

मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर ताजा मुकदमे में एएसआई के संरक्षित परिसर को मूलत: ‘जामा मस्जिद' बताते हुए दावा किया गया है कि समुदाय के लोग इसमें पिछले 700 साल से नमाज अदा कर रहे हैं. धार के जेबरान अंसारी और मुस्लिम समुदाय के दो अन्य लोगों ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को इस मुकदमे की जानकारी सोमवार को दायर अंतरिम अर्जी में दी और अदालत से अनुरोध किया कि मुकदमे से जुड़े दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिया जाए. इस अर्जी में तीनों लोगों ने भोजशाला विवाद को लेकर उच्च न्यायालय में हिंदू पक्ष की दायर एक याचिका में हस्तक्षेपकर्ता बनने का प्रस्ताव रखा है.

मध्य प्रदेश के राजपत्र और राजस्व रिकॉर्ड का दिया हवाला

मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने बताया कि हमने धार की एक दीवानी अदालत में पिछले हफ्ते दायर मुकदमे में कहा है कि समूचा विवादित परिसर वक्फ (धर्मार्थ अर्पित संपत्ति) की पंजीकृत मिल्कियत है, जिसे मूलत: जामा मस्जिद के नाम से जाना जाता है. उन्होंने कहा कि मुकदमे में मध्य प्रदेश के राजपत्र और राजस्व रिकॉर्ड के साथ ही एएसआई के ‘वैध कानूनी दस्तावेज' पेश किए गए हैं और पूरे विवादित परिसर पर मुस्लिम पक्ष के मालिकाना हक का दावा किया गया है.

'मस्जिद का धार्मिक स्वरूप अपरिवर्तनीय'

वारसी ने बताया कि मुकदमे में कहा गया है कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों के तहत 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार की मस्जिद का धार्मिक स्वरूप अपरिवर्तनीय है और इसकी रक्षा अदालत द्वारा की जानी चाहिए. इसमें यह भी कहा गया है कि मस्जिद में नमाज अदा करने की 700 साल पुरानी परंपरा पर कोई भी प्रतिबंध मुस्लिम समुदाय के मौलिक धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होगा जिसकी भरपाई धन से नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा कि धार की दीवानी अदालत में दायर मुकदमे पर पिछले हफ्ते हुई सुनवाई में प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए गए जिनमें एएसआई, केंद्र सरकार और राज्य सरकार शामिल हैं. वारसी ने बताया कि इस मुकदमे पर 10 अप्रैल को अगली सुनवाई होनी है. उन्होंने बताया कि मुकदमे के जरिये विवादित परिसर में एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण को चुनौती भी दी गई है.

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एएसआई ने उच्च न्यायालय के आदेश पर दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी. एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि इस परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा प्राचीन मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था. भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष संभवतः 11वीं सदी के इस स्मारक को मस्जिद बताता रहा है.

धार के ऐतिहासिक परिसर को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के मुताबिक हिंदुओं को इस परिसर में प्रत्येक मंगलवार पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार वहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है.

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