Matka Price Hike: गर्मी से राहत के लिए आम तौर पर ठंडे पानी का सेवन किया जाता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मटके या सुराही का ठंडा पानी पीना चाहिए. कई जगह तो मिट्टी से बने मटके को देशी फ्रिज भी कहा जाता है. ये देशी फ्रिज अब महंगा हो गया है. मटका बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के दाम तीन गुना तक बढ़ गए हैं, जिससे इसकी लागत बढ़ गई है. मटका बनाने वाले कलाकार इसको लेकर चिंतित है. साथ ही मिट्टी से बने बर्तनों का स्वरूप भी समय के साथ बदलता जा रहा है. आधुनिकता का रंग इन बर्तनों पर चढ़ चुका है.
Mitti Ke Bartan: मिट्टी के बर्तनों की दुकान
माटी कलाकारों का क्या कहना है?
आगर-मालवा में शहर के बीचोबीच शासकीय कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल के सामने सड़क के दोनों तरफ किनारों पर इन दिनों मटके का बाजार लगा हुआ है. पूरे साल इतनी दुकानें नहीं लगती, जितनी इन दिनों लगी हुई है. पैंतीस डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे बहुत तेज धूप है और स्कूल की बाहरी दीवार से सट कर मनोज कुंभकार अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मटके की दुकान लगा कर बैठे मिले.
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मनोज ने आगे बताया कि पहले तो ठंडे पानी के लिए मिट्टी के बने मटके का ही साधन था. मगर अब इलेक्ट्रॉनिक साधन आने से उनके रोजगार कर फर्क पड़ गया है. लोग फ्रिज खरीदते है या फिर पानी का कैम्पर ले लेते है.
Mitti Ke Bartan: मिट्टी के आकर्षक बर्तन
आकर्षक बर्तनों का दौर
मटके को आकर्षक बनाने के लिए बाहरी सतह पर एक खास तरह की मिट्टी से कलाकृति बनाई जाती है. स्थानीय बोली में कलाकृति बनाने के लिए उपयोग होने वाली मिट्टी को पांडु और गेरू कहा जाता है. पहले इसके लिए जलपाऊस का इस्तेमाल होता था, मगर अब यह नहीं मिलता है. इसकी खदानें खत्म हो चुकी हैं. मनोज की दुकान के ठीक सामने की तरफ मन को लुभाने वाले रंग बिरंगे मटके अलग अलग स्वरूप में नजर आते है.
Mitti Ke Bartan: मिट्टी के बर्तनों की दुकान
माटी कला के क्षेत्र में रुचि रखने वाले तेजसिंह चौहान कहते है कि भारतीय परंपरा में मिट्टी के बर्तनों का अपना महत्व और स्थान रहा है. ये समय काल में वाणिज्य और व्यवसाय के साथ रोजगार का बड़ा माध्यम रहा है. ये केवल लोगों के लिए रोजी रोटी का साधन नहीं रहे बल्कि हमारी कला और संस्कृति के प्रतीक रहे है. मिट्टी के बर्तनों के आकार और उन पर की गई कलाकृति के रंगों का उपयोग हमारे गौरवशाली अतीत को प्रतिबिंबित करते रहे है. आधुनिक दौर में जो बदलवा इन मिट्टी में बर्तनों में देखने को मिल रहा है ये लोगो की सोच में बदलाव की तरफ इशारा करता है. मगर इसमें चिंता का विषय यह है कि जो ऐतिहासकि कला है, इसके नाश होने का खतरा भी है.
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Mitti Ke Bartan: मिट्टी के बर्तनों की दुकान
गुजराती मटकों के अलावा दूसरे मिट्टी के बर्तन भी आधुनिक डिजाइन में बनकर आने लगे है. जिसे शौकियाना लोग खरीदते है. पहले दाल या सभी बनाने के लिए मिट्टी की हांडी इस्तेमाल होती आ रही है अब इसकी जगह राजकोट में नई तरह की हांडी बनने लगी है. जो प्रेशर कुकर का काम करती है. गुजराती पानी की बोतल इस तरह से डिजाइन की गई है जो देखने में दूर से प्लास्टिक की नजर आती है. वहीं सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाने वाली पेयजल की प्याऊ पर इस्तेमाल होने वाली राँझन देवास जिले खातेगांव से बन कर आती है. एक राँझन में करीब पचास लीटर तक पानी आता है और इसकी ठंडक घंटों तक बनी रहती है. इसमें प्लास्टिक का नल भी लगा होता है ताकि गहराई ज्यादा होने के कारण राँझन के तल तक पानी आसानी से निकाला जा सके.
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एक दिन में एक कलाकार ज्यादा से ज्यादा बीस मटके नहीं बना पाता है. सामग्री महंगी होने और काम की रफ्तार कम रहने के चलते लोगों का इस कला से मोह भंग होता जा रहा है. जिसका सीधा असर इसके दाम पर आ रहा है. जो मटका पहले पचास रुपए का होता था अब सौ डेढ़ सौ रुपए तक पड़ता है. ग्राहक माल के पूरे पैसे नहीं देते.
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