Mitti Ke Bartan: तापमान के साथ ही बढ़ गए देशी फ्रिज के दाम! जानिए मिट्‌टी कलाकारों की परेशानी

Mitti Ke Bartan: देशी मटके के दाम ज्यादा होंने के बावजूद यह आम लोगों की पहली पसंद बना हुआ है. आधुनिक परिवेश में आने वाले नए डिजाइन के मटके भले दिखने में आकषर्क हो ठंडे पानी के लिए देशी मटके का विकल्प अभी दूर की कोड़ी है. हालांकि कुम्हार वर्ग की अपनी वाजिब समस्याएं हैं. उनकी लागत लगातार बढ़ रही है. मार्केट में नए-नए डिजाइन भी आ रहे हैं. आइए देखिए NDTV की ये खास रिपोर्ट

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Mitti Ke Bartan: माटी कलाकारों का दर्द

Matka Price Hike: गर्मी से राहत के लिए आम तौर पर ठंडे पानी का सेवन किया जाता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मटके या सुराही का ठंडा पानी पीना चाहिए. कई जगह तो मिट्टी से बने मटके को देशी फ्रिज भी कहा जाता है. ये देशी फ्रिज अब महंगा हो गया है. मटका बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के दाम तीन गुना तक बढ़ गए हैं, जिससे इसकी लागत बढ़ गई है. मटका बनाने वाले कलाकार इसको लेकर चिंतित है. साथ ही मिट्टी से बने बर्तनों का स्वरूप भी समय के साथ बदलता जा रहा है. आधुनिकता का रंग इन बर्तनों पर चढ़ चुका है.

Mitti Ke Bartan: मिट्‌टी के बर्तनों की दुकान

माटी कलाकारों का क्या कहना है?

आगर-मालवा में शहर के बीचोबीच शासकीय कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल के सामने सड़क के दोनों तरफ किनारों पर इन दिनों मटके का बाजार लगा हुआ है. पूरे साल इतनी दुकानें नहीं लगती, जितनी इन दिनों लगी हुई है. पैंतीस डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे बहुत तेज धूप है और स्कूल की बाहरी दीवार से सट कर मनोज कुंभकार अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मटके की दुकान लगा कर बैठे मिले.

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मनोज ने NDTV को बताया कि उनके परिवार में करीब पच्चीस लोग है और उनकी रोजी रोटी मटका बनाने और बेचने से चलती है. करीब तीस सालों से परिवार में मटका बनाने के काम चल रहा है. सभी लोग यही काम करते है. गांव में लगभग 75 परिवार पहले यही काम करते थे मगर अब सिर्फ 15 परिवारों में ही ये काम होता है. 

मनोज ने आगे बताया कि पहले तो ठंडे पानी के लिए मिट्टी के बने मटके का ही साधन था. मगर अब इलेक्ट्रॉनिक साधन आने से उनके रोजगार कर फर्क पड़ गया है. लोग फ्रिज खरीदते है या फिर पानी का कैम्पर ले लेते है.

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Mitti Ke Bartan: मिट्‌टी के आकर्षक बर्तन

आकर्षक बर्तनों का दौर

मटके को आकर्षक बनाने के लिए बाहरी सतह पर एक खास तरह की मिट्टी से कलाकृति बनाई जाती है. स्थानीय बोली में कलाकृति बनाने के लिए उपयोग होने वाली मिट्टी को पांडु और गेरू कहा जाता है. पहले इसके लिए जलपाऊस का इस्तेमाल होता था, मगर अब यह नहीं मिलता है. इसकी खदानें खत्म हो चुकी हैं. मनोज की दुकान के ठीक सामने की तरफ मन को लुभाने वाले रंग बिरंगे मटके अलग अलग स्वरूप में नजर आते है.

करीब जाने पर मटकों के साथ मिट्टी के बने अन्य बर्तन भी दिखाई देते है. यहां रोटी बनाने के लिए मिट्टी का तवा, बोतल के आकार का मिट्टी का जल दान, सब्जी पकाने के लिए खास डिजाइन की हुई हांडी, बड़ी कोठीनुमा दिखाई देने वाली राँझन, सुराही के अलावा पानी के कैम्पर के आकार वाली नल लगे हुए गुजराती मटके, मिट्टी के कलश, दीपक, बच्चों की बचत वाली गुल्लक और पक्षियों को दाना पानी रखने वाले सकोरे भी दिखते है. यह सब चीजें परम्परागत मिट्टी के बर्तनों में समय के साथ होने वाले बदलावा को प्रमाणित करती है.

Mitti Ke Bartan: मिट्‌टी के बर्तनों की दुकान

माटी कला के क्षेत्र में रुचि रखने वाले तेजसिंह चौहान कहते है कि भारतीय परंपरा में मिट्टी के बर्तनों का अपना महत्व और स्थान रहा है. ये समय काल में वाणिज्य और व्यवसाय के साथ रोजगार का बड़ा माध्यम रहा है. ये केवल लोगों के लिए रोजी रोटी का साधन नहीं रहे बल्कि हमारी कला और संस्कृति के प्रतीक रहे है. मिट्टी के बर्तनों के आकार और उन पर की गई कलाकृति के रंगों का उपयोग हमारे गौरवशाली अतीत को प्रतिबिंबित करते रहे है. आधुनिक दौर में जो बदलवा इन मिट्टी में बर्तनों में देखने को मिल रहा है ये लोगो की सोच में बदलाव की तरफ इशारा करता है. मगर इसमें चिंता का विषय यह है कि जो ऐतिहासकि कला है, इसके नाश होने का खतरा भी है.

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दुकान का संचालन करने वाले संजय कुंभकार अपने हाथों में एक गुजराती मटका ले कर बताते है कि इस तरह के मटके गुजरात के राजकोट से बन कर आते है. इसमें खास तरह की मिट्टी का इस्तेमाल होता है, जो स्थानीय स्तर पर नहीं मिलती. देखें में यह ऐसे लगता है जैसे मशीन के सांचे में ढालकर बनाया गया हो मगर यह हाथों से ही बना हुआ है. इस पर बेहतरीन रंग बिरंगे फूलों की डिजाइन ग्राहकों को आकर्षित करती है. ग्राहक आजकल इस तरह के मटके पसंद करते है. इसकी कीमत भी देसी फ्रिज से ज्यादा होती है.

Mitti Ke Bartan: मिट्‌टी के बर्तनों की दुकान

गुजराती मटकों के अलावा दूसरे मिट्टी के बर्तन भी आधुनिक डिजाइन में बनकर आने लगे है. जिसे शौकियाना लोग खरीदते है. पहले दाल या सभी बनाने के लिए मिट्टी की हांडी इस्तेमाल होती आ रही है अब इसकी जगह राजकोट में नई तरह की हांडी बनने लगी है. जो प्रेशर कुकर का काम करती है. गुजराती पानी की बोतल इस तरह से डिजाइन की गई है जो देखने में दूर से प्लास्टिक की नजर आती है. वहीं सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाने वाली पेयजल की प्याऊ पर इस्तेमाल होने वाली राँझन देवास जिले खातेगांव से बन कर आती है. एक राँझन में करीब पचास लीटर तक पानी आता है और इसकी ठंडक घंटों तक बनी रहती है. इसमें प्लास्टिक का नल भी लगा होता है ताकि गहराई ज्यादा होने के कारण राँझन के तल तक पानी आसानी से निकाला जा सके.

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दौर बदलता जा रहा है. इसके साथ ग्राहकों की पसंद भी बदलती जा रही है. देसी मटकों की लागत बहुत ज्यादा होती जा रही है. पहले मिट्टी की ट्रॉली 1500 रूपए में आती थी अब 6 हजार रुपए में एक ट्रॉली मिट्टी आ रही. मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए लकड़ी की जरूरत पड़ती है. वहीं चार सौ रुपए क्विंटल हो गई है. इसके कारण जो लागत है वो तीन से चार गुना बढ़ गई.

एक दिन में एक कलाकार ज्यादा से ज्यादा बीस मटके नहीं बना पाता है. सामग्री महंगी होने और काम की रफ्तार कम रहने के चलते लोगों का इस कला से मोह भंग होता जा रहा है. जिसका सीधा असर इसके दाम पर आ रहा है. जो मटका पहले पचास रुपए का होता था अब सौ डेढ़ सौ रुपए तक पड़ता है. ग्राहक माल के पूरे पैसे नहीं देते.

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