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This Article is From Aug 29, 2023

कभी माओवादी संगठन में थी शामिल, आज बनी महिला कमांडो... पढ़िए पूरी कहानी

सरेंडर से पहले राजकुमारी नक्सल संगठन की सक्रिय सदस्य थी. वह बताती हैं कि सलवा जुडूम (शांति यात्रा) से पहले अपने परिवार के साथ गांव में खुशहाल जिंदगी जी रही थीं. सलवा जुडूम के दौरान कमोवेश हालात ऐसे बदल गए कि वह नक्सलियों के संगठन में शामिल हो गई.

कभी माओवादी संगठन में थी शामिल, आज बनी महिला कमांडो... पढ़िए पूरी कहानी

बस्तर: आज पूरा देश तरक्की कर रहा है और इस में महिलाएं भी बढ़ चढ़कर योगदान दे रही है. आज महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वह किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं. आज हम आपको एक ऐसी जांबाज महिला की कहानी से रूबरू कराएंगे जिनके हाथों में कभी सरकार के खिलाफ हथियार थे, जो भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित नक्सल संगठन की सक्रिय सदस्य हुआ करतीं थीं. मगर वक्त के साथ हालात ऐसे बदले कि अब वही नक्सली महिला कथित लाल क्रांति का दामन छोड़कर देश के साथ काम कर रही हैं. जी हां, देश के लिए ये महिला कमांडो नक्सल संगठन के खात्मे के लिए AK-47 लेकर जंगलों का खाक छान रहीं हैं. 

"जिस राह पर मैं चल पड़ी थी वहां से कभी भी मेरी मौत की खबर आ सकती थी, लेकिन भाई के खतों से दिल इस कदर पसीजा कि माओवाद के घुप अंधेरे से मैं बाहर आ गई. साढ़े पांच साल तक मेरे नाम की राखी भाई की कलाई पर सज नहीं पाई थी. "


कौन है राजकुमारी यादव? 

ये दास्तां है कभी माओवाद का दामन थामने वाली राजकुमारी यादव की. वैसे तो बस्तर के बीहड़ में नक्सलवाद की राह पर कदम बढ़ा चुकी सैकड़ों राजकुमारी हैं, जिनकी कहानी हूबहू मिलती जुलती होगी. साल 2019 तक माओवादी संगठन में सक्रिय राजकुमारी वर्तमान में नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध में सबसे कारगर डीआरजी में महिला कमांडो दस्ते का हिस्सा हैं. 

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भाई के खतों से पसीजा दिल 

सरेंडर से पहले राजकुमारी नक्सल संगठन की सक्रिय सदस्य थी. वह बताती हैं कि सलवा जुडूम (शांति यात्रा) से पहले अपने परिवार के साथ गांव में खुशहाल जिंदगी जी रही थीं. सलवा जुडूम के दौरान कमोवेश हालात ऐसे बदल गए कि वह नक्सलियों के संगठन में शामिल हो गई. साढ़े पांच साल तक मानो परिवार वालों से उसका कोई वास्ता ना था, लेकिन इस बीच डीआरजी में तैनात उसका भाई बहन को मुख्यधारा में लाने की ठान खत पर खत लिखता रहा. 

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देश की "राजकुमारी"

अपने भाई की खबर राजकुमारी को मिलती रही.आखिरकार भाई के खतों से उसका मन पसीजा और खूनी संघर्ष की राह को छोड़कर उन्होंने मुख्यधारा में लौट आने का फैसला किया. नतीजा यह रहा कि सरेंडर के बाद उन्हें नौकरी मिली और वह पांच साल के लंबे इंतजार के बाद भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकी. राजकुमारी की मानें तो सही मायनों में यही रक्षाबंधन है कि भाई की जिद से आज वो उस राह से लौट आईं जिसकी मंजिल जेल की सलाखों या फिर मौत के मुहाने तक लेकर जाती थी.


सुमित्रा चापा से भी मिलिए

सुमित्रा चापा भी राजकुमारी की तरह सरेंडर माओवादी हैं और डीआरजी में शामिल हैं. खुशी इस बात कि है कि वह अपने परिवार के पास लौट आई हैं. उनका भाई सीआरपीएफ में है. चूंकि फोर्स में होने की वजह से दोनों छुट्टी की गारंटी तो नहीं दे सकते, लेकिन देर से ही सही भाई की कलाई सूनी ना रहे, इसलिए वह डाक के ज़रिए से राखी भिजवा चुकी हैं. 

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