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ड्रोन दीदी सावित्री साहू: हौसलों को मिला तकनीक का साथ, 2 घंटे का काम 10 मिनट में कर बदली जिंदगी 

Success Story Drone Didi: नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत छत्तीसगढ़ की सावित्री साहू ने ड्रोन तकनीक अपनाकर खेती में बड़ा बदलाव किया. अब 2 घंटे का काम सिर्फ 10 मिनट में पूरा हो रहा है और वे आत्मनिर्भर बन चुकी हैं.

ड्रोन दीदी सावित्री साहू: हौसलों को मिला तकनीक का साथ, 2 घंटे का काम 10 मिनट में कर बदली जिंदगी 

Success Story Drone Didi: कभी खेतों में घंटों मेहनत करने वाली सावित्री साहू आज उसी काम को कुछ ही मिनटों में पूरा कर रही हैं. छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले के छोटे से गांव खपरी तेली से निकली यह सक्‍सेस स्‍टोरी सिर्फ एक महिला की सफलता नहीं, बल्कि बदलते ग्रामीण भारत की नई तस्वीर है.

न्‍यूज एजेंसी IANS के अनुसार ‘नमो ड्रोन दीदी योजना' से जुड़ने के बाद सावित्री ने न सिर्फ अपने सपनों को नई उड़ान दी, बल्कि खेती के पारंपरिक तरीके को भी चुनौती दी. आज हालात यह हैं कि पूरा गांव उन्हें नाम से नहीं, बल्कि पहचान से बुलाता है-“ड्रोन दीदी”.

छत्तीसगढ़ की सावित्री साहू की जिंदगी भी आम ग्रामीण महिलाओं की तरह ही थी, जहां शादी के बाद परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों के लिए जगह कम ही बचती है. पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ करने की इच्छा तो थी, लेकिन वक्त और परिस्थितियों ने उस इच्छा को पीछे धकेल दिया.

इसी बीच जब उन्हें ‘नमो ड्रोन दीदी योजना' के बारे में पता चला, तो उन्होंने इसे एक अवसर की तरह लिया. आवेदन किया, चयन हुआ और ग्वालियर में ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण मिला. यह प्रशिक्षण उनके जीवन का turning point साबित हुआ. 

Success Story Drone Didi Savitri Sahu Khairagarh Chhattisgarh

Success Story Drone Didi Savitri Sahu Khairagarh Chhattisgarh

सावित्री साहू ने ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण लिया. जब वे प्रशिक्षण लेकर गांव लौटीं, तो उनके अंदर आत्मविश्वास था और हाथों में तकनीक. धीरे-धीरे उन्होंने ड्रोन से खेती का काम शुरू किया और देखते ही देखते उनकी पहचान बदल गई. अब वे सिर्फ एक किसान नहीं रहीं, बल्कि गांव की “ड्रोन दीदी” बन गईं.

खेती में तकनीक का असर 

ड्रोन तकनीक ने सावित्री की खेती करने की पूरी प्रक्रिया को बदल दिया. पहले जहां एक एकड़ खेत में दवाइयों का छिड़काव करने में दो घंटे से ज्यादा समय लगता था, वहीं अब वही काम महज 10 मिनट में पूरा हो जाता है. यह बदलाव सिर्फ समय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई बड़े फायदे भी सामने आए हैं.

अब दवाइयों और पानी का उपयोग पहले से कम हो गया है, जिससे लागत घट रही है. साथ ही छिड़काव ज्यादा सटीक होने के कारण फसल की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद भी बढ़ी है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब इस काम के लिए ज्यादा मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे खेती आसान और किफायती बन गई है.

सावित्री अब अपने खेतों के अलावा आसपास के किसानों के खेतों में भी ड्रोन से छिड़काव कर रही हैं. इससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है और वे धीरे-धीरे एक सेवा प्रदाता के रूप में भी अपनी पहचान बना रही हैं.  

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आर्थिक मजबूती के साथ बदली पहचान

एक समय ऐसा था जब सावित्री पूरी तरह अपने पति पर निर्भर थीं, लेकिन आज वे खुद कमाई कर रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं. उनकी इस सफलता के पीछे उनके पति प्रेमचंद साहू का भी सहयोग रहा है.

प्रेमचंद बताते हैं कि वे लंबे समय से खेती को आधुनिक बनाने के लिए ड्रोन खरीदना चाहते थे, लेकिन इसकी कीमत ज्यादा होने के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था. सरकारी योजना के तहत मिली सब्सिडी ने उनके इस सपने को साकार कर दिया.

अब स्थिति यह है कि जहां पहले आर्थिक तंगी एक बड़ी समस्या थी, वहीं आज ड्रोन के जरिए आय के नए रास्ते खुल गए हैं और परिवार की जिंदगी पहले से ज्यादा आसान हो गई है.

गांव की महिलाओं के लिए नई राह

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत शुरू की गई ‘नमो ड्रोन दीदी योजना' का असर अब जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है. सावित्री साहू जैसी महिलाएं इस बात का उदाहरण हैं कि अगर सही प्रशिक्षण और संसाधन मिल जाएं, तो ग्रामीण महिलाएं भी आधुनिक तकनीक को अपनाकर आगे बढ़ सकती हैं.

जिला पंचायत सीईओ प्रेम कुमार पटेल ने बताया कि इस योजना के तहत राज्य के अलग-अलग जिलों में महिलाओं का चयन कर उन्हें सब्सिडी पर ड्रोन उपलब्ध कराए गए हैं. सभी चयनित महिलाओं को ग्वालियर में प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे तकनीक को बेहतर तरीके से समझ सकें और उसका उपयोग कर सकें.

‘ड्रोन दीदी' अब सिर्फ नाम नहीं, बदलाव की पहचान भी

सावित्री साहू की कहानी यह बताती है कि बदलाव सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है. गांवों में भी अब तकनीक पहुंच रही है और वहां की महिलाएं उसे अपनाकर अपनी किस्मत खुद लिख रही हैं. आज “2 घंटे का काम 10 मिनट में” सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलाव की मिसाल है, जिसने एक महिला को पहचान, सम्मान और आत्मनिर्भरता तीनों एक साथ दिए हैं. 
 

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