छत्तीसगढ़ के कोरिया में जिला प्रशासन ने हाल ही में सड़कों से घुमंतू मवेशियों को हटाकर गौधामों में सुरक्षित रखने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का बड़ा अभियान शुरू किया है. कलेक्टर रोक्तिमा यादव की अध्यक्षता में हुई जिला स्तरीय गौधाम समिति की बैठक में चारा, पानी, शेड, स्वास्थ्य जांच, टैगिंग और अन्य मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन एनडीटीवी की पड़ताल में ग्राम पंचायत चेरवापारा के रकेया स्थित गौधाम की तस्वीर प्रशासन के दावों से बिल्कुल अलग नजर आई.
गौ सेवक अनुराग कुमार दुबे का आरोप है कि करीब चार दिन पहले रात के समय ट्रैक्टरों से 100 से अधिक बेसहारा गायों और बैलों को गौधाम में लाकर बंद कर दिया, लेकिन उनके लिए न चारे की व्यवस्था है, न भूसा, न पानी और न ही कोई स्थायी देखभाल.

बछड़े भूख-प्यास से तड़प रहे
उनका कहना है कि पशुपालन विभाग ने पहले सभी व्यवस्थाएं पूरी करने का भरोसा दिया था, लेकिन हकीकत में जानवरों को केवल जेल की तरह बंद कर छोड़ दिया गया है. उनका दावा है कि छोटे-छोटे बछड़े भूख और प्यास से तड़प रहे हैं और यदि किसी भी गोवंश की मौत होती है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.
देखदेख को नहीं पहुंचा कोई चरवाहा
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चरवाहों की नियुक्ति का दावा किया गया, लेकिन आज तक कोई उनकी देखरेख के लिए नहीं पहुंचा. ग्रामीण सच्चिदानंद राजवाड़े ने भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि यह गौधाम गांव के स्थानीय आवारा पशुओं के लिए बनाया गया था, लेकिन बाहर से बड़ी संख्या में मवेशियों को लाकर यहां भर दिया गया है.
गौधाम में नहीं कोई व्यवस्था
सबसे गंभीर बात यह है कि उनके भोजन और पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई, जिससे पशुओं की जान पर संकट मंडरा रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन मवेशियों को गौधाम में रखता है तो पहले उनके चारा, पानी और उपचार की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए अन्यथा उन्हें खुले में छोड़ दिया जाए. ताकि वे कहीं भी चरकर अपना पेट भर सकें.
एक ओर प्रशासन सड़क सुरक्षा और गोवंश संरक्षण की बात कर रहा है. वहीं, दूसरी ओर चेरवापारा गौधाम से सामने आई तस्वीरें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिना मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए मवेशियों को गौधामों में बंद करना गोसंरक्षण है या फिर उनकी जिंदगी को संकट में डालना.
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