MP Farmers Budget Expectations: मध्य प्रदेश, जिसे देश का 'अनाज का कटोरा' कहा जाता है, आज एक अजीब से विरोधाभास के बीच खड़ा है. काली उपजाऊ मिट्टी और सोयाबीन, चना, मसूर के अंतहीन विस्तार वाला यह प्रदेश एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है. केंद्रीय बजट आने वाला है और इस बार सीहोर की निगाहें कुछ ज़्यादा ही उम्मीद से ठहरी हुई हैं. वजह साफ़ है—देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसी मिट्टी की उपज हैं. यहां के हर खेत की हरियाली आज एक ही सवाल पूछ रही है कि क्या इस बार का बजट सिर्फ काग़ज़ों पर होगा या हमारी जेबों तक भी पहुंचेगा.
मसालों की खुशबू के बीच छिपा दर्द
मध्य प्रदेश आज केवल अनाज ही नहीं, बल्कि पूरी कृषि अर्थव्यवस्था का आधार बन चुका है. गेहूँ उत्पादन में अव्वल रहने के साथ ही यह चना, मसूर और सोयाबीन में पंजाब-हरियाणा को पीछे छोड़ चुका है. देश की 44 प्रतिशत औषधीय फसलें यहीं उगती हैं और मसालों की दुनिया में भी इस प्रदेश का डंका बजता है. टमाटर उत्पादन में भी यह राज्य देश में सबसे आगे है. लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद, यहां का किसान आज भी अपनी आमदनी को लेकर संघर्ष कर रहा है. सीहोर का 'गोल्डन ग्रेन' यानी शरबती गेहूं दुनिया भर में मशहूर है, पर इसे उगाने वाला किसान आज भी खाली हाथ खड़ा है.
उलझावन के रूप सिंह की थकी हुई नज़रें
गांव उलझावन के बाहर पचास साल के रूप सिंह अपने खेत में उपले बटोरते हुए सिस्टम की थकान साफ़ बयां करते हैं. पांच लोगों के परिवार का पेट तीन एकड़ ज़मीन के भरोसे है. रूप सिंह की नज़रें बार-बार उस प्याज़ की फसल की तरफ जाती हैं, जो इस बार कौड़ियों के दाम भी नहीं बिकी और खेत में ही सड़ गई. वे भारी मन से कहते हैं कि उन्हें सिर्फ अपना हक चाहिए. वे चाहते हैं कि गेहूं चार हज़ार और सोयाबीन छह हज़ार प्रति क्विंटल बिके. खेती अब इतनी महंगी हो चुकी है कि बीमा का प्रीमियम भरने के बाद भी समय पर मुआवज़ा नहीं मिलता.
देव सिंह की व्यथा और 'परीक्षा' लेती खेती
रूप सिंह के भाई देव सिंह का परिवार और भी बड़ा है—आठ लोग. वे कहते हैं कि अब खेती मां जैसी ममतामयी नहीं रही, बल्कि वह रोज़ एक नई परीक्षा लेती है. बारिश आती है तो सब कुछ बहा ले जाती है, न मुआवज़ा मिलता है और न ही फसल के सही दाम. चार सौ रुपये की यूरिया और भावांतर योजना के पैसे में होने वाली देरी ने किसानों की कमर तोड़ दी है. खेत की मेड़ पर बैठे अन्य किसान भी दबी ज़ुबान में कहते हैं कि यह हमारी मांग नहीं है, बल्कि खेती और किसान को बचाने की आखिरी शर्तें हैं.
MP Farmers Budget Expectations: कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के चुनाव क्षेत्र सिहोर के किसानों ने बजट को लेकर अपनी अपेक्षाएं NDTV से साझा कीं
जमुनाबाई की भीगी उंगलियाँ और पाँच रुपये का गट्ठा
चंदेरी की ओर जाते हुए जमुनाबाई मेथी तोड़ते हुए पसीने से तर-बतर हैं. उनकी उंगलियां मेथी तोड़ते-तोड़ते हरी हो चुकी हैं, लेकिन हिसाब लगाने बैठती हैं तो हाथ खाली रह जाते हैं. बीज, खाद, पानी और मज़दूरी के खर्च के बाद जब मेथी पांच रुपये गट्ठा बिकता है, तो पसीने की कीमत भी वसूल नहीं हो पाती. छोटे किसानों की इस पीड़ा में पांच एकड़ वाले प्रेमसिंह भी शामिल हैं, जिनकी सोयाबीन की फसल बारिश में खराब हो गई लेकिन मुआवज़ा अब तक नहीं मिला. वहीं डेढ़ एकड़ वाले गेंदा लाल तो कपड़े सिलकर अपने घर का गुज़ारा करने को मजबूर हैं.
व्यापारी का मुनाफ़ा और किसान की दो ट्रॉली प्याज़
पिपलिया मीरा के संतोष मेवाड़ा की कहानी भी अलग नहीं है. आठ एकड़ में खेती करने वाले संतोष ने एक लाख की लागत से पैदा हुई 400 कट्टा प्याज़ सिर्फ 20 हज़ार में बेच दी. रमेश और बंशीलाल जैसे किसान सीधा आरोप लगाते हैं कि सारा मुनाफ़ा व्यापारी की जेब में जाता है. रमेश ने तो अपनी जेब से कर्ज़ की पर्ची निकालते हुए बताया कि उन्हें दो ट्रॉली प्याज़ फेंकनी पड़ी. उनकी माँग है कि सरकार निर्यात खोले और कर्ज़ माफ़ी की दिशा में ठोस कदम उठाए. बड़े किसान एम.एस. मेवाड़ा भी मानते हैं कि जब तक शरबती गेहूँ और सोयाबीन के दाम सम्मानजनक नहीं होंगे, तब तक खेती लाभ का धंधा नहीं बन पाएगी.
उम्मीदों का 'कृषक कल्याण वर्ष' और ज़मीनी हकीकत
दूसरी तरफ, सरकार की अपनी तैयारी है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने साल 2026 को 'कृषक कल्याण वर्ष' घोषित किया है. सरकार का दावा है कि 16 विभाग मिलकर किसानों की बेहतरी के लिए काम करेंगे. सोलर पंप, मंडियों का आधुनिकीकरण, माइक्रो इरीगेशन और शून्य प्रतिशत ब्याज जैसी योजनाओं का रोडमैप तैयार है. सोयाबीन के बाद सरसों में भी भावांतर लागू करने और फूड पार्कों की स्थापना के वादे काग़ज़ों पर बेहद सुनहरे दिखते हैं. लेकिन सीहोर की काली मिट्टी पर बैठा किसान इन वादों को अपनी सड़ी हुई फसल और बढ़ते कर्ज़ के तराजू पर तौल रहा है. उनके लिए सवाल यह नहीं है कि क्या कहा गया, बल्कि यह है कि उन तक वास्तव में क्या पहुंचा.
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