Sagar Teacher: मजबूत इरादों के आगे हर बाधा छोटी पड़ जाती है. इस बात को सागर जिले की बंडा तहसील में पदस्थ दिव्यांग शिक्षक रंजीत सिंह लोधी ने अपनी मेहनत और समर्पण से साबित कर दिया है. शासकीय हाई स्कूल पथरिया गौड़ में कार्यरत लोधी अपनी शारीरिक अक्षमता को पीछे छोड़ते हुए ‘सचल रथ' के माध्यम से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की रोशनी फैला रहे हैं. उनका यह प्रयास न केवल विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन चुका है.
रंजीत सिंह लोधी का कार्य केवल स्कूल तक सीमित नहीं है. वे अपने कर्तव्यों से आगे बढ़कर शिक्षा को हर घर तक पहुंचाने का संकल्प लेकर काम कर रहे हैं. दिनभर स्कूल में पढ़ाने के बाद भी उनका मिशन थमता नहीं. वे छुट्टी के दिनों और रात के समय अपने विशेष रूप से तैयार दिव्यांग वाहन ‘सचल रथ' पर सवार होकर संकुल के करीब सात गांवों का नियमित दौरा करते हैं. उनका उद्देश्य स्पष्ट है—कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे और हर छात्र अपने भविष्य को लेकर जागरूक बने.
गांव-गांव जाकर बच्चों-अभिभावकों से करते बातचीत
इन दौरों के दौरान वे गांव-गांव जाकर बच्चों और उनके अभिभावकों से संवाद करते हैं. वे आगामी शैक्षणिक सत्र के लिए अधिक से अधिक छात्रों का नामांकन सुनिश्चित करने के प्रयास में जुटे रहते हैं. साथ ही, बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की समस्याओं को मौके पर ही समझकर उनका समाधान भी करते हैं. कई बार वे देर रात तक विद्यार्थियों को पढ़ाते और मार्गदर्शन देते देखे जाते हैं, जिससे उनकी लगन और प्रतिबद्धता का अंदाजा लगाया जा सकता है.
हर गांव में एक टोली का किया गठन
रंजीत सिंह लोधी ने शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता का भी बीड़ा उठाया है. उन्होंने हर गांव में ‘ग्राम जागरूकता टोली' का गठन किया है, जो उनके इस अभियान का मजबूत आधार बन चुकी है. इस टोली में गांव के पूर्व छात्र, प्रबुद्ध नागरिक और जागरूक युवा शामिल हैं. यह समूह शिक्षा के साथ-साथ स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संस्कारों के प्रति लोगों को जागरूक करने का कार्य करता है. टोली के सदस्य गांव में नियमित रूप से बैठकें करते हैं और समाज को सकारात्मक दिशा देने में सहयोग करते हैं.
इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य कम संसाधनों में गांवों के समग्र विकास का मजबूत ढांचा तैयार करना है. रंजीत सिंह का मानना है कि जब तक समाज खुद जागरूक नहीं होगा, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है. इसलिए वे शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम मानते हैं और उसी दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं.
आदिवासी इलाकों में बढ़ रही जागरूकता
उनकी मेहनत का असर अब स्पष्ट रूप से नजर आने लगा है. आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते कई छात्र अब उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. हाल ही में उनके मार्गदर्शन में पढ़ने वाले चार छात्रों का चयन ‘अग्निवीर' योजना में हुआ है, जो इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है. इसके अलावा कई छात्र बी फार्मा और पॉलिटेक्निक जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर अपने भविष्य को संवारने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
आर्थिक रूप से कमजोर स्टूडेंट्स की मदद
रंजीत सिंह लोधी की विशेषता यह भी है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की हर संभव मदद करते हैं. जरूरतमंद छात्रों की फीस, किताबें और अन्य शैक्षणिक सामग्री का खर्च वे स्वयं उठाते हैं. उनका मानना है कि आर्थिक तंगी किसी भी बच्चे की पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए. इसी सोच के चलते वे कई बच्चों के लिए संबल बनकर सामने आए हैं.
शिक्षा के अलावा वे ग्रामीणों को शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी भी देते हैं. वे गांवों में चौपाल लगाकर लोगों को योजनाओं के बारे में विस्तार से बताते हैं, ताकि पात्र हितग्राही इनका लाभ उठा सकें. इस पहल से ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ी है और कई लोगों को योजनाओं का लाभ भी मिल रहा है.
सागर जिले में हो रही चर्चा
उनके इस सेवा भाव और समर्पण की चर्चा अब पूरे सागर जिले में हो रही है. लोग उन्हें एक आदर्श शिक्षक और समाजसेवी के रूप में देख रहे हैं. उनका कार्य यह साबित करता है कि सच्ची लगन और इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है.
अपने कार्यों को लेकर रंजीत सिंह लोधी कहते हैं कि शिक्षक का धर्म केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण करना है. मेरा प्रयास है कि कोई भी बच्चा सुविधाओं के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे और हर गांव में शिक्षा की ज्योति प्रज्वलित हो.
वास्तव में, रंजीत सिंह लोधी का यह प्रयास समाज के लिए प्रेरणास्रोत है. उनका ‘सचल रथ' केवल एक वाहन नहीं, बल्कि शिक्षा और जागरूकता का प्रतीक बन चुका है, जो गांव-गांव में नई उम्मीद और उजाले की किरण फैला रहा है.