राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के 435 किलोमीटर क्षेत्र के नदी तट पर लगभग 8 से 9 हजार कछुआ शावक विचरण के लिए मुक्त किए गए हैं. ये विलुप्तप्राय विशेष प्रजाति के कछुए 'बाटागुर बास्का' (Batagur baska) और 'बाटागुर धोंगोका' (Batagur dhongoka) हैं. इनका संरक्षण व संवर्धन विगत 10 वर्षों से विशेष परियोजना के तहत किया जा रहा है. ये दोनों कछुए 'हार्ड शेल' (Hard Shell) प्रजाति के हैं. अंडों से निकलने के कुछ घंटे बाद ही नन्हे कछुआ शावक किनारे पर आने वाली लहरों के विपरीत तैरते हुए नदी में विचरण करने लगते हैं.
दरअसल, चंबल नदी के प्रदूषण मुक्त वातावरण में विलुप्तप्राय जलीय जीव घड़ियाल के साथ-साथ अब विशेष प्रकार के कछुओं का संरक्षण व संवर्धन तेजी से किया जा रहा है. इन विलुप्तप्राय जलीय जीवों (बाटागुर बास्का और बाटागुर धोंगोका) के लिए राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के बरौली (श्योपुर), बटेश्वरा एवं उसैदघाट (मुरैना) तथा ज्ञानपुरा (भिंड) जिले में नदी के तट पर 5 महीने के लिए कृत्रिम हैचिंग सेंटर बनाया जाता है. वहीं, भिंड जिले के बरही घाट पर एक बड़ा पालन केंद्र संचालित किया जा रहा है.
10,000 से भी अधिक अंडों की हैचिंग हो रही
कृत्रिम हैचरी के दोनों साइड पांच-पांच किलोमीटर तक नदी के तट पर मादा कछुओं द्वारा दिए गए अंडों को एकत्रित करके सुरक्षित रखा जाता है. प्रतिवर्ष लगभग 10,000 से भी अधिक अंडों की हैचिंग हो रही है. एक कृत्रिम हैचरी में 50 से 60 घोंसलों को लाकर एकत्रित किया जाता है. एक घोंसले में अंडों की संख्या 20 से 30 होती है. 27 मई बुध्वार की सुबह उसैदघाट पर लगभग 52 शावक अंडों से बाहर निकले. इन सभी शावकों को सुबह ही चंबल नदी में विचरण के लिए तत्काल मुक्त कर दिया गया.
चंबल नदी को प्रदूषण मुक्त रखने में कछुओं की अहम भूमिका
विगत दो वर्ष पूर्व आरंभ किए गए बरही सेंटर पर प्रतिवर्ष सैकड़ों कछुआ शावक नदी से लाकर संरक्षित किए जा रहे हैं. इस केंद्र पर देश की अशासकीय वन्यजीव संस्था (NGO) द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है. वन अधिकारियों का कहना है कि आगामी कुछ वर्षों में 'सॉफ्ट शेल' (Soft Shell) के कछुओं को संरक्षित करने की योजना भी आरंभ की जाएगी. विलुप्तप्राय जलीय जीव कछुओं को संरक्षित और संवर्धित करने से जैव विविधता (Biodiversity) बनी रहेगी. चंबल नदी को प्रदूषण मुक्त रखने में कछुआ प्रजाति अहम भूमिका का निर्वहन करती है.