SEIAA चेयरमैन की चिट्ठी से प्रशासनिक भूचाल: MP में 237 पर्यावरण मंजूरियों और 17 एकड़ जंगल कटाई पर उठाए सवाल

मध्य प्रदेश में स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) के अध्यक्ष शिव नारायण सिंह चौहान ने मुख्य सचिव को एक विस्फोटक पत्र लिखा है. इसमें उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों पर बिना मूल्यांकन के 237 अवैध पर्यावरण मंजूरियां (EC) जारी करने, 17 एकड़ सरकारी जंगल को नुकसान पहुंचाने और उनके कक्ष में ताला लगाने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं.

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मध्य प्रदेश में स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी के अध्यक्ष शिव नारायण सिंह चौहान.

मध्य प्रदेश में पर्यावरण मंजूरियों को लेकर आई एक विस्फोटक चिट्ठी ने बड़ा प्रशासनिक तूफान खड़ा कर दिया है. स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) के अध्यक्ष र‍िटायर्ड आईएएस शिव नारायण सिंह चौहान ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में ऐसे गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनसे प्रदेश की पर्यावरण मंजूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो गए हैं.

शिव नारायण सिंह चौहान की चिट्ठी में क्या है?

इस चिट्ठी का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला आरोप 237 पर्यावरण मंजूरियों और संदर्भ की शर्तों से जुड़ा है. SEIAA अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि 237 मामलों में SEIAA से मूल्यांकन कराए बिना ही पर्यावरण अनुमति और टीओआर जारी कर दिए गए. पत्र में दावा किया गया है कि यह सब वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत या भूमिका से हुआ, जबकि पर्यावरण कानून के तहत पर्यावरण अनुमति जारी करने का अधिकार केवल भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय या संबंधित राज्य के SEIAA को ही है. राज्य सरकार के किसी भी अधिकारी को अपने स्तर पर पर्यावरण मंजूरी देने का वैधानिक अधिकार नहीं है.

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मामला सिर्फ फाइलों और प्रक्रियाओं की गड़बड़ी तक सीमित नहीं है. चिट्ठी में इन कथित अवैध मंजूरियों को सीधे पर्यावरणीय नुकसान से भी जोड़ा गया है. SEIAA अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि दो मामलों में कथित अवैध पर्यावरण मंजूरी के कारण अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति हुई है और 17 एकड़ सरकारी जंगल से सैकड़ों पेड़ काट दिए गए. पत्र में दुख जताया गया है कि इतना गंभीर मामला सामने आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

SEIAA अध्यक्ष ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम 1968 और अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कठोर कार्रवाई की मांग की है. पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होने से अधिकारियों में कानून तोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है और SEIAA के कामकाज में लगातार दखल दिया जा रहा है.

चिट्ठी में एक और बेहद गंभीर और हैरान करने वाला आरोप लगाया गया है. SEIAA अध्यक्ष ने दावा किया है कि उनके कक्ष (ऑफिस) में ताला लगा दिया गया था, जिससे प्राधिकरण का काम बाधित हुआ. पत्र के अनुसार, यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं था, बल्कि SEIAA की स्वतंत्र कार्यप्रणाली को बलपूर्वक रोकने की कोशिश थी. आरोप है कि इस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं की गई.

NGT के आदेशों का हवाला

पत्र में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के 3 फरवरी 2026 के आदेश का भी हवाला दिया गया है. SEIAA अध्यक्ष के मुताबिक, NGT ने माना था कि प्रमुख सचिव और सदस्य सचिव को पर्यावरण मंजूरी जारी करने का कोई अधिकार नहीं था. पत्र में यह भी दावा किया गया है कि NGT ने कुछ पर्यावरण मंजूरियों को शून्य (निरस्त) घोषित कर SEIAA से पुनः मूल्याकंन कराने का आदेश दिया था, लेकिन अध्यक्ष के बार-बार अनुरोध के बावजूद इन मामलों को मूल्यांकन के लिए एजेंडा में शामिल नहीं किया गया.

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SEIAA अध्यक्ष ने 39 कथित अवैध और बिना औपचारिक मंजूरी के स्वतः मान्य (Deemed) माने गए टीओआर का मुद्दा भी उठाया है. पत्र में आरोप है कि इन्हें निरस्त करने के बजाय एक वरिष्ठ अधिकारी ने आदेश जारी कर दिया कि राज्य सरकार बिना औपचारिक मंजूरी के स्वतः मान्य मानी गई पर्यावरण मंजूरी (Deemed EC) को उचित मानती है. अध्यक्ष के मुताबिक, यह आदेश कानून के सर्वथा विपरीत है और इससे प्रदेश में निवेश से जुड़े मामले भी अटक रहे हैं.

करोड़ों का निवेश और राजस्व प्रभावित

ख़त में दावा किया गया है कि एक मामले में अवैध टीओआर निरस्त नहीं होने के कारण प्रदेश में करीब 300 करोड़ रुपये का निवेश प्रभावित हो रहा है. इससे राज्य को मिलने वाली जीएसटी (GST) राशि और रोजगार के अवसरों पर भी बुरा असर पड़ रहा है. यानी SEIAA अध्यक्ष की चिट्ठी के मुताबिक, एक तरफ जहां कथित अवैध मंजूरियों से पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ, वहीं दूसरी तरफ इन वैधानिक गड़बड़ियों के कारण प्रदेश का निवेश भी अटक रहा है.

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इस चिट्ठी से SEIAA और प्रदेश के पर्यावरण प्रशासन के बीच का गहरा टकराव खुलकर सामने आ गया है. अध्यक्ष ने सीधा आरोप लगाया है कि जिस सचिवालय को SEIAA की मदद और सुविधा के लिए होना चाहिए था, वही सचिवालय अब SEIAA को नियंत्रित और बाधित करने का माध्यम बन गया है.

मुख्य सचिव से सख्त कदम उठाने की अपील

SEIAA अध्यक्ष ने मुख्य सचिव से भारत सरकार की 7 जनवरी 2025 की अधिसूचना का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कराने की मांग की है. इस अधिसूचना के मुताबिक, राज्य सरकार को SEIAA और उसकी समिति के लिए सुचारू वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध करानी होती है. लेकिन पत्र में आरोप है कि इस प्रावधान का उपयोग SEIAA को सहयोग देने के बजाय उसके काम में अड़ंगा लगाने के लिए किया जा रहा है.

अध्यक्ष ने मुख्य सचिव से की मांग 

  1. SEIAA की बैठकें नियमित रूप से आयोजित की जाएं.
  2. बैठक की कार्यवाही को समय सीमा के भीतर आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड किया जाए.
  3. कथित तौर पर जारी किए गए अवैध टीओआर और अवैध पर्यावरण मंजूरियां तुरंत रद्द की जाएं.
  4. प्रभावित मामलों का SEIAA से दोबारा पारदर्शी मूल्यांकन कराया जाए.
  5. इन गंभीर अनियमितताओं में शामिल दोषी अधिकारियों पर कठोर अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई हो.

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या मध्य प्रदेश में वाकई सैकड़ों पर्यावरण मंजूरियां बिना किसी वैधानिक स्क्रूटनी के जारी कर दी गईं? क्या इन कथित अवैध मंजूरियों की वजह से ही 17 एकड़ सरकारी जंगल के सैकड़ों पेड़ों की बलि चढ़ गई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा NGT के आदेशों की भी अनदेखी की गई? और इन सबसे ऊपर यह सवाल कि प्रदेश की पर्यावरण मंजूरी व्यवस्था नियम-कायदों के अनुसार SEIAA चला रहा है या फिर वे अधिकारी, जिन पर खुद SEIAA अध्यक्ष ने इतने गंभीर आरोप लगाए हैं? इन बेहद गंभीर और संवेदनशील आरोपों पर अब राज्य सरकार के आधिकारिक जवाब का इंतजार है.

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