अनरय की होली: गमगीन परिवारों को लगाते हैं रंग, घर-घर पहुंचकर मनाई जाती है ये परंपरा

मध्यप्रदेश के सीहोर में मनाई जाने वाली अनोखी परंपरा अनरय की होली में होली की शुरुआत गमगीन परिवारों को रंग लगाकर की जाती है. फ़ाग मंडलियां ढोलक और मंजीरों की धुन पर शोकग्रस्त घरों तक पहुंचकर उन्हें गुलाल लगाकर संवेदना और साथ का संदेश देती हैं.

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Anaray Holi Festival MP: मध्य प्रदेश के सीहोर में होली की शुरुआत एक अनोखी और संवेदनशील परंपरा से होती है, गमी यानी अनरय की होली. रंगों के इस पर्व की पहली शाम यहां खुशी से ज्यादा संवेदना दिखती है. फ़ाग मंडलियां ढोलक‑नगड़िया और झांझ‑मंजीरों की धुनों पर लोकगीत गाते हुए उन घरों तक पहुंचती हैं, जहां हाल ही में किसी का निधन हुआ हो. परिवारों को हल्का करने, शोक से बाहर लाने और समाज का स्नेह महसूस कराने के लिए उन्हें सबसे पहले गुलाल लगाया जाता है.

कैसे मनाई जाती है गमी (अनरय) की होली?

सीहोर नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में फ़ाग मंडलियां पहले शोक संतृप्त परिवारों के घर जाती हैं. पारंपरिक वाद्यों की ताल पर लोकगीत गाते हुए वे दरवाज़े पर जुटते हैं, अंदर बुलाए जाने पर परिवार के सदस्यों को आदर के साथ हल्का सा रंग‑गुलाल लगाया जाता है. इसका आशय है कि “हम सब आपके साथ हैं, दुख धीरे‑धीरे छंटे और जीवन में फिर रंग लौटें.”

समुदाय की भागीदारी और संदेश

यह परंपरा केवल रस्म नहीं, सामुदायिक सहारा भी है. मोहल्ले‑गांव के लोग फ़ाग मंडलियों के साथ शामिल होकर शोकग्रस्त परिवारों से मिलते हैं, हाल‑चाल पूछते हैं और एकजुटता का भाव जताते हैं. इस तरह होली का पहला रंग संवेदना और साथ निभाने का होता है, जो परिवारों को गम से उबारने की सामाजिक कोशिश है.

पहले दिन रंगोत्सव क्यों नहीं मनाते?

सीहोर में पहले दिन पारंपरिक खेल‑तमाशा या रंगों की धूम नहीं होती. मान्यता है कि होली की शुरुआत शोक में डूबे घरों को संबल देने से हो. इसलिए पहले दिन गमी की होली, और उसके बाद अगले दिन पूरे उत्साह के साथ रंग‑गुलाल, अबीर, ढोल‑मंजीरे और शुभकामनाएं यहीं से असली रौनक शुरू होती है.

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पांच दिन का रंगोत्सव

क्षेत्र में होली से लेकर रंग पंचमी तक उत्सव का सिलसिला पांच दिन चलता है. गमी की होली के बाद, दूसरा दिन रंगों की बौछारों, मिलने‑जुलने और बधाइयों का होता है. फिर पारंपरिक फ़ाग, घूमर, और लोकनृत्यों के साथ रंग पंचमी तक उल्लास बना रहता है. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है और पीढ़ियों को सहअनुभूति और मिल‑बैठकर खुशियां बांटने की सीख देती है.