हद है ! MP के सागर में एक ऐसा गांव जहां मोबाइल चार्ज करने के लिए 5 किलोमीटर दूर जाते हैं ग्रामीण

MP के सागर में विकास के दावों की पोल खुल रही है. सागर शहर से महज 5 किमी दूर स्थित नरयावली विधानसभा के एक गांव में आज भी लोग ढिबरी युग में रहने को मजबूर हैं. यहां मोबाइल चार्ज करने के लिए गांव वालों को 5 किलोमीटर दूर शहर जाना पड़ता है.

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डिजिटल इंडिया और हर घर निर्बाध बिजली पहुंचाने के तमाम दावों के बीच मध्यप्रदेश के सागर जिले से एक ऐसी जमीनी हकीकत सामने आई है, जो विकास की पोल खोलती है. सागर जिला मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव आज भी अंधेरे में डूबा हुआ है. इस गांव में बिजली के खंभे खड़े हैं और उन पर तार भी खिंचे हुए हैं, लेकिन इन तारों में करंट नहीं दौड़ता. नतीजा यह है कि आधुनिक युग में भी यहां के ग्रामीण रात गुजारने के लिए दीपक और ढिबरी का सहारा ले रहे हैं.हद तो ये है कि इस डिजिटल दौर में भी मोबाइल फोन चार्ज करने जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी ग्रामीणों को रोजाना 5 किलोमीटर का सफर तय कर सागर शहर आना पड़ता है. इस पूरे मामले में बिजली विभाग का कहना है कि गांव में अलग से घरेलू फीडर न होने के कारण यह समस्या है और अब शासन को नया प्रस्ताव भेजा गया है.

शाम ढलते ही थम जाती है जिंदगी, बच्चों की पढ़ाई भगवान भरोसे

यह पूरा मामला नरयावली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक आदिवासी बहुल गांव का है. इस गांव में करीब एक हजार मतदाता रहते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि गांव के हालातों का सबसे बुरा असर यहां की नई पीढ़ी पर पड़ रहा है. ढलती शाम के साथ ही पूरा गांव जब अंधेरे की आगोश में समा जाता है, तो बच्चों के सामने पढ़ाई का बड़ा संकट खड़ा हो जाता है. छात्रों को ढिबरी, लालटेन या टॉर्च की रोशनी में अपनी किताबें खोलनी पड़ती हैं. कई बार बच्चे मोबाइल की टॉर्च जलाकर पढ़ते हैं, लेकिन जब मोबाइल की बैटरी ही खत्म हो जाती है, तो वह रास्ता भी बंद हो जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि बिजली न होने से न तो बच्चे ढंग से पढ़ पा रहे हैं और न ही घरों का कामकाज सामान्य तरीके से हो पाता है. गर्मी और बरसात के मौसम में तो उमस और कीड़े-मकोड़ों के डर के बीच रात काटना किसी सजा से कम नहीं होता.

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युवाओं ने कभी नहीं देखी दिन की रोशनी में बिजली, रोजगार भी ठप

गांव के युवाओं का दर्द है कि उन्होंने अपने बचपन से लेकर आज तक गांव में कभी भी नियमित रूप से बिजली की सप्लाई नहीं देखी. अगर कभी कभार बिजली आती भी है, तो वह देर रात कुछ घंटों के लिए आती है, जिसका कोई व्यावहारिक फायदा ग्रामीणों को नहीं मिल पाता. दिनभर बिजली गुल रहने के कारण गांव में रोजगार और स्वरोजगार के सारे रास्ते बंद हैं. युवाओं का कहना है कि अगर गांव में रेगुलर बिजली मिलने लगे, तो यहां आटा चक्की, वेल्डिंग दुकान, सिलाई-कढ़ाई और छोटे-मोटे कुटीर उद्योग शुरू किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को पलायन नहीं करना पड़ेगा.

घरेलू फीडर ही नहीं है मौजूद, खेतों की लाइन से मिल रही सप्लाई

इस पूरी समस्या को लेकर जब बिजली विभाग के अभियंता (इंजीनियर) दीपक अहिरवार से बात की गई, तो उन्होंने इसके पीछे की मुख्य तकनीकी वजह साफ की. उन्होंने बताया कि इस गांव के लिए अभी तक अलग से कोई घरेलू फीडर (Domestic Feeder) उपलब्ध ही नहीं है. वर्तमान में गांव के भीतर जो थोड़ी-बहुत बिजली पहुंच रही है, वह दरअसल खेतों की सिंचाई के लिए चलाई जाने वाली एग्रीकल्चर लाइन से जुड़ी है. यही कारण है कि गांव के घरों को चौबीसों घंटे और नियमित बिजली नहीं मिल पा रही है.
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शासन को भेजा गया प्रस्ताव, मंजूरी मिलते ही शुरू होगा काम

अभियंता दीपक अहिरवार ने ग्रामीणों को आश्वासन देते हुए बताया कि विभाग इस समस्या के स्थायी समाधान पर काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि गांव के लिए एक नया और विशेष घरेलू फीडर स्थापित करने का विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया गया है. जैसे ही सरकार से इस प्रस्ताव और बजट को हरी झंडी मिलती है, वैसे ही फीडर निर्माण का काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया जाएगा. इसके बाद ग्रामीणों को बिना किसी रुकावट के नियमित घरेलू बिजली आपूर्ति मिलने लगेगी.

कब दौड़ेगा तारों में करंट?

बिजली के खंभे और तारों का ढांचा होने के बावजूद अंधेरे में रहने को मजबूर यह गांव आज शासन-प्रशासन के सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है. ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों से लेकर नेताओं तक गुहार लगाई है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका. फिलहाल, बिजली विभाग के इस नए दावे के बाद गांव के लोगों की आंखें अब इस उम्मीद में टिकी हैं कि सरकारी फाइल को जल्द मंजूरी मिलेगी और उनके गांव के बिजली के खंभों में भी करंट दौड़ना शुरू होगा, ताकि उन्हें मोबाइल चार्ज करने जैसी छोटी सी जरूरत के लिए भी शहर की तरफ न भागना पड़े.
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