एमपी गणगौर पर्व: पूरे प्रदेश में धूमधाम से मनता है ये त्योहार, 16 दिनों तक होती है पूजा

मध्य प्रदेश के राजगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में गणगौर पर्व बड़े उत्साह और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है. होलिका दहन के अगले दिन से शुरू होकर चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन तक चलने वाला यह 16 दिनों का त्योहार महिलाओं और लड़कियों के लिए विशेष महत्व रखता है.

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Gangaur Festival 2026: मध्य प्रदेश में गणगौर का त्योहार सिर्फ पूजा भर नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और महिलाओं की भावनाओं का गहरा संगम है. राजगढ़ के माचलपुर समेत पूरे प्रदेश में यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. होलिका दहन के अगले दिन से शुरू होकर चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन तक चलने वाला यह 16 दिनों का उत्सव महिलाओं और लड़कियों के लिए बेहद खास माना जाता है. भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित यह व्रत सुख-समृद्धि, पति की दीर्घायु और मनचाहे वर की कामना के साथ बड़ी श्रद्धा से निभाया जाता है.

उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाने वाला पर्व

राजगढ़ जिले के माचलपुर में गणगौर का व्रत लड़कियों और महिलाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है. लड़कियां शिव जैसे आदर्श पति की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं. गांव-नगर में चारों ओर भक्ति गीतों की गूंज रहती है और महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ गणगौर माता की पूजा करती हैं.

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व्रत की शुरुआत और 16 दिनों की परंपरा

यह व्रत होलिका दहन के दूसरे दिन, यानी पड़वा से शुरू होता है और चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन समाप्त होता है. मान्यता है कि इस पूरे समय में माता पार्वती अपने पीहर में रहती हैं. गणगौर तीज के दिन तक चलने वाले इन 16 दिनों में महिलाएं प्रतिदिन ईश्वर, गौरा और बासक जी की पूजा करती हैं.

गीत, पूजा और बाग देने की परंपरा

गांव की गलियों में इन दिनों माहौल बिल्कुल त्योहार जैसा होता है. हजारों की संख्या में महिलाएं इकट्ठी होकर गणगौर के पारंपरिक गीत गाती हैं. गणगौर के दिनों में ‘बाग देने' की खास परंपरा भी निभाई जाती है. जिन महिलाओं का उस वर्ष विवाह हुआ हो, वे विशेष रूप से बाग देती हैं. इस बाग में महिलाएं नृत्य करती हैं, गीत गाती हैं और फिर भोजन या नाश्ता करने के बाद पूरे नगर में जुलूस निकालते हुए अपने घर लौटती हैं.

गणगौर माता के 16 पुत्र और उनसे जुड़ी मान्यता

गणगौर माता के 16 पुत्रों का पूजन भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है. एक प्रचलित मान्यता के अनुसार जिन दंपतियों को संतान नहीं होती, वे गणगौर के दिन माता के पुत्रों में से एक को बिना बताए घर ले जाकर रखते हैं. विश्वास है कि अगले वर्ष गणगौर तक उन्हें संतान की प्राप्ति होती है. इसके अलावा, विसर्जन के समय यह भी माना जाता है कि यदि गणगौर माता के सोलह पुत्रों में से कोई कमी रह जाए, तो माता पानी में तैरती रहती हैं और तभी विसर्जित होती हैं, जब सभी 16 पुत्र पूरी संख्या में मौजूद हों.