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अमरकंटक के औषधीय वन में भीषण आग, 50 हेक्टेयर में 27 हजार से ज्यादा पौधे जलकर राख; वन विभाग की लापरवाही उजागर

Forest Fire Anuppur: अनूपपुर के अमरकंटक वन परिक्षेत्र में औषधीय वन में आग, 27 हजार से ज्यादा पौधे जले. चौकीदार के खुलासों से वन विभाग की लापरवाही उजागर. पढ़िए पूरी खबर.

अमरकंटक के औषधीय वन में भीषण आग, 50 हेक्टेयर में 27 हजार से ज्यादा पौधे जलकर राख; वन विभाग की लापरवाही उजागर
अमरकंटक के औषधीय वन में आग के बाद जली जमीन

Forest Fire Anuppur: अनूपपुर जिले के अमरकंटक वन परिक्षेत्र में स्थित औषधीय वन में लगी आग ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. करीब 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस औषधीय वन में 27 हजार 500 से अधिक पौधे जलकर राख हो गए. जिस वन से औषधीय संरक्षण और जैव विविधता को मजबूत करने की उम्मीद थी, वही विभागीय लापरवाही का शिकार बन गया. मौके पर तैनात चौकीदार ने NDTV से बातचीत में ऐसे खुलासे किए हैं, जिन्होंने आगजनी को हादसा नहीं बल्कि अनदेखी का नतीजा साबित कर दिया है. हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े नुकसान पर वन विभाग अब तक चुप्पी साधे हुए है.

अमरकंटक के औषधीय वन में भीषण आग

यह घटना अनूपपुर जिले के अमरकंटक वन परिक्षेत्र की है, जहां 50 हेक्टेयर में विकसित औषधीय वन अचानक आग की चपेट में आ गया. आग इतनी तेज थी कि देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में लगे औषधीय पौधे जलकर पूरी तरह नष्ट हो गए. इस वन में कुल 27,500 पौधे लगाए गए थे, जिनमें कई दुर्लभ और औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियां शामिल थीं.

मौके पर चौकीदार ने खोली लापरवाही की पोल

घटना के बाद जब NDTV की टीम मौके पर पहुंची, तो वहां तैनात चौकीदार ने वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए. चौकीदार के अनुसार, उन्हें अक्सर अलग‑अलग क्षेत्रों में आग बुझाने के लिए भेज दिया जाता था, जिसके चलते इस औषधीय वन की नियमित निगरानी प्रभावित होती रही.

Forest Fire: अमरकंटक के औषधीय वन में भीषण आग

Forest Fire: अमरकंटक के औषधीय वन में भीषण आग
Photo Credit: Ajay Kumar Patel

न खाद, न कीटनाशक, न सफाई

चौकीदार ने बताया कि वर्ष 2021‑22 में पौधारोपण किए जाने के बाद से अब तक इन औषधीय पौधों में कभी खाद नहीं डाली गई. न ही कीटनाशक दवाइयों का कोई इस्तेमाल किया गया. सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले करीब एक साल से इस पूरे क्षेत्र में झाड़‑झंखाड़ और सूखी घास की सफाई भी नहीं कराई गई. यही सूखा कचरा आग के फैलने का सबसे बड़ा कारण बना.

खरपतवार बनी आग का ईंधन

पौधों के बीच फैली सूखी घास और झाड़ियों ने आग को तेजी से फैलने में मदद की. आग लगने के बाद इस पूरे इलाके में आग बुझाने के लिए पर्याप्त इंतजाम भी नहीं दिखे. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में पूरा औषधीय वन आग में खाक हो गया और हजारों पौधे नष्ट हो गए.

करोड़ों की योजना, लेकिन निगरानी नदारद

यह घटना उन सवालों को और मजबूत करती है कि आखिर करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई योजनाओं की देखरेख इतनी ढीली क्यों है. अमरकंटक जैसे संवेदनशील और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र में इस तरह की लापरवाही कई बड़े पर्यावरणीय नुकसान की ओर इशारा करती है. बताया जा रहा है कि इस औषधीय वन के आसपास आबादी वाला क्षेत्र भी है, इसके बावजूद सुरक्षा और निगरानी के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए.

विभाग की चुप्पी, जिम्मेदारी तय नहीं

इतने बड़े नुकसान के बावजूद वन विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. न यह स्पष्ट किया गया है कि आग कैसे लगी, और न ही यह कि इस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्सर कागजी कार्यवाही में व्यस्त रहने वाला विभाग मौके पर आवश्यक रखरखाव नहीं कर पाया.

पर्यावरण और औषधीय विरासत को बड़ा झटका

औषधीय पौधों का यह वन न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अहम था, बल्कि इसका उद्देश्य पारंपरिक औषधीय ज्ञान और वन संसाधनों को संरक्षित करना भी था. एक ही आग ने वर्षों की मेहनत और संसाधनों को खत्म कर दिया.

जांच और जवाबदेही की मांग

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी या नहीं. पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ऐसे हादसे दोबारा भी हो सकते हैं. फिलहाल यह औषधीय वन विभागीय लापरवाही की एउटा बड़ी मिसाल बन चुका है.

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