दिव्य रहस्य और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है MP का ये शिव मंदिर... महाशिवरात्रि पर भक्तों का लगता तांता, जानिए इसकी खासियत

Mahashivratri 2026: नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में परमार वंश के शासक उदयादित्य ने कराया था, जो महान राजा राजा भोज के पुत्र थे. उन्हीं के नाम पर यह नगरी उदयपुर कहलायी. मंदिर की स्थापत्य शैली काफी अद्भुत है...

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Neelkantheshwar Mahadev Temple Vidisha: यह मंदिर वास्तुकला के लिए काफी प्रसिद्ध है.

Neelkantheshwar Mahadev Temple Vidisha: मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन नगरी उदयपुर महाशिवरात्रि के अवसर पर आस्था का बड़ा केंद्र बन जाती है. यहां स्थित 10वीं शताब्दी का भव्य नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर इस पावन पर्व पर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठता है. महाशिवरात्रि की रात यहां केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, स्थापत्य और दिव्यता का उत्सव बन जाती है, जहां हर-हर महादेव के जयघोष के साथ पूरी नगरी शिवमय हो जाती है.

 हजार वर्षों की विरासत, अडिग आस्था का प्रतीक

इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में परमार वंश के शासक उदयादित्य ने कराया था, जो महान राजा राजा भोज के पुत्र थे. उन्हीं के नाम पर यह नगरी उदयपुर कहलायी. मंदिर की स्थापत्य शैली अद्भुत है... ऊंचा शिखर, भव्य तोरण, सजीव मूर्तिकला और गूढ़ वास्तु संरचना इसे मध्यभारत के श्रेष्ठ शिवालयों में स्थान दिलाती है. मंदिर का गगनचुंबी शिखर दूर से ही दिखाई देता है, मानो आकाश को छूने का प्रयास कर रहा हो.

दीवारों और स्तंभों पर शिव, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, गणेश और शिवगणों की बारीक नक्काशी इस बात का प्रमाण है कि यह स्थल कभी कला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा होगा.

महाशिवरात्रि की जागती रात

महाशिवरात्रि के दिन सुबह 4 बजे से ही मंदिर के पट खुल जाते हैं. अभिषेक, रुद्रपाठ और विशेष पूजन आरंभ हो जाता है. जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जाती है. संध्या होते-होते मंदिर परिसर दीपों और रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठता है. ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद और "हर-हर महादेव" के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है.

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रात 12 बजे होने वाली महाआरती इस पर्व का चरम क्षण होता है. हजारों श्रद्धालु एक साथ जब दीप प्रज्वलित करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों.

सूर्य की पहली किरण और दिव्य रहस्य

नीलकंठेश्वर मंदिर की वास्तुकला का एक अनोखा रहस्य है. सूर्योदय की पहली किरण सीधे गर्भगृह में स्थित विशाल शिवलिंग पर पड़ती है. महाशिवरात्रि की भोर में यह दृश्य और भी अद्भुत हो उठता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सूर्यदेव स्वयं भगवान नीलकंठ से आशीर्वाद लेने उपस्थित हुए हों. यह अद्भुत दृश्य श्रद्धालुओं के लिए जीवनभर की स्मृति बन जाता है.

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आक्रमणों से जूझकर भी अमर

इतिहासकारों के अनुसार दिल्ली सल्तनत काल में सेनापति मलिक काफूर ने इस मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया था. ज्वलनशील पदार्थों से मंदिर को जलाने की कोशिश की गई, जिसका प्रमाण आज भी मंदिर के अंदरूनी हिस्से के कालेपन में दिखाई देता है. किन्तु आस्था की यह धरोहर अडिग रही. बाद में 1775 में भेलसा के सूबेदार खांडेराव अप्पाजी ने शिवलिंग पर पीतल का आवरण चढ़ाकर विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कराई. वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है.

नटराज की अद्भुत शिला प्रतिमा

मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी की तलहटी में एक ही शिला पर उकेरी गई लगभग 30 फीट लंबी भगवान नटराज की मोहक प्रतिमा स्थित है. महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु यहां भी दर्शन करने पहुंचते हैं.

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मेले जैसा दृश्य, उमड़ता है जनसैलाब

महाशिवरात्रि पर उदयपुर में मेला सा दृश्य होता है। स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति द्वारा विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं. प्रसाद, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का आयोजन होता है. श्रद्धालु जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित कर भोलेनाथ से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. पूरी रात चलने वाला जगराता इस नगरी को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है.

केवल पर्व नहीं, दिव्य अनुभव

उदयपुर का नीलकंठेश्वर धाम महाशिवरात्रि पर केवल एक तीर्थ नहीं रहता. यह एक दिव्य अनुभव बन जाता है. यहां इतिहास की गूंज, शिल्प की भव्यता और भक्ति की शक्ति एक साथ महसूस होती है.

जब भोर की पहली किरण शिवलिंग को स्पर्श करती है और हजारों श्रद्धालु एक स्वर में “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं कैलाश पर्वत इस धरती पर अवतरित हो गया हो. महाशिवरात्रि पर उदयपुर की यह रात केवल देखी नहीं जाती… बल्कि आत्मा में उतर जाती है.

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