Beef Scam: कथित गौ-मांस रैकेट की जांच में अब आया नाटकीय मोड़, बेजुबानों के स्वास्थ्य पर भी उठे गंभीर सवाल

Bhopal beef Case: एनडीटीवी के पास मौजूद 4 फरवरी 2026 का एक आदेश इस पूरे मामले की गंभीरता को उजागर करता है. इस आदेश में प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख (PCCF) ने स्पष्ट किया है कि नगर निगम की ओर से पहले ही फर्जी बताए जा चुके लाइसेंसों के आधार पर वन विहार में मांस सप्लाई की गई. इसे “अत्यंत संवेदनशील मामला” माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वन्य प्राणियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा है.

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Bhopal Beef Meet Scam news: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कथित गौ-मांस रैकेट और फर्जी मांस लाइसेंस घोटाले की जांच ने अब नाटकीय मोड़ ले लिया है. यह जांच शहर के सबसे संवेदनशील वन्य क्षेत्र वन विहार नेशनल पार्क तक पहुंच गई है. भोपाल नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा और वन विभाग के आधिकारिक दस्तावेज़ इस बात की पुष्टि करते हैं कि पूरी तरह फर्जी घोषित किए गए लाइसेंसों के आधार पर वन विहार में मांस की आपूर्ति की जाती रही, जिससे लापरवाही, मिलीभगत और प्रशासनिक पर्देदारी के साथ-साथ बेजुबान जानवरों के स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

एनडीटीवी के पास मौजूद 4 फरवरी 2026 का एक आदेश इस पूरे मामले की गंभीरता को उजागर करता है. इस आदेश में प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख (PCCF) ने स्पष्ट किया है कि नगर निगम की ओर से पहले ही फर्जी बताए जा चुके लाइसेंसों के आधार पर वन विहार में मांस सप्लाई की गई. इसे “अत्यंत संवेदनशील मामला” माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वन्य प्राणियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा है. लिहाजा, PCCF ने वन विहार प्रबंधन को तीन दिन के भीतर आंतरिक जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं.

बड़ी लापरवाही आई सामने

इस खुलासे के केंद्र में नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा का 16 मई 2025 का पत्र है, जिसकी एक प्रति एनडीटीवी के पास है. इस पत्र में अमजद कुरैशी और अयाज कुरैशी के नाम से जारी मटन और चिकन दुकानों के मांस विक्रय लाइसेंस को स्पष्ट रूप से फर्जी और अमान्य घोषित किया गया था. इसके बावजूद आरोप है कि वन विहार में मांस की आपूर्ति जारी रही. इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि वन विहार प्रबंधन ने लाइसेंसों की सत्यता की जांच क्यों नहीं की और एक संरक्षित वन्य क्षेत्र में ऐसी चूक कैसे होने दी गई.

अधिकारियों पर लग रहे हैं मिलीभगत के आरोप

यह मामला भोपाल के चर्चित जिंसी स्लॉटर हाउस से जुड़ा है, जिसे पहले गौ मांस के आरोपों में सील किया जा चुका है, जो मामला शुरुआत में अवैध मांस व्यापार तक सीमित लग रहा था, वह अब एक बड़े और संगठित घोटाले का रूप ले चुका है. नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा के एक अलग पत्र में यह भी सामने आया है कि 5 मई 2025 को असलम कुरैशी उर्फ़ असलम चमड़ा के स्लाटर हाउस के सभी दस्तावेज़ फर्जी पाए गए थे. इसके बावजूद न तो कोई FIR दर्ज की गई और न ही तत्काल कोई कार्रवाई हुई, जिसके पीछे अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाया जा रहा है.

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 संरक्षण देने का लग रहा आरोप

शिकायतकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अजय दुबे ने वन विभाग को दी गई शिकायत में इसे महज़ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जानबूझकर संरक्षण देने का प्रयास बताया है. PCCF के सीधे हस्तक्षेप के बाद अब वन विहार प्रबंधन, नगर निगम और पुलिस तीनों की भूमिका गहन जांच के दायरे में आ गई है.

कांग्रेस ने की जवाबदेही तय करने की मांग

राजनीतिक स्तर पर भी इस मामले ने तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी है. कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने कहा है कोई भी किसी भी स्तर का व्यक्ति का यदि सम्मिलित रहेगा, तो उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए. गौ माता का संरक्षण और संवर्धन यह हमारी कटिबद्धता और संकल्प भी है. कोई भी हो उसे बख्शा नहीं जाएगा. वहीं, पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा ने बीजेपी की “ट्रिपल इंजन सरकार” पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि खुलेआम गौ-वध हुआ, पकड़ा भी गया, लेकिन फिर भी कार्रवाई नहीं हुई और सख्त जवाबदेही की मांग की.

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व्यापार के साथ बढ़ा दबदबा

जांच एजेंसियों का कहना है कि जिंसी स्लॉटर हाउस एक संगठित नेटवर्क की तस्वीर पेश करता है, जहां धर्म, पैसा, डर और सिस्टम आपस में गहराई से जुड़े दिखते हैं. आरोप है कि भैंस के मांस की आड़ में गौ-मांस की तस्करी की जाती रही. इस नेटवर्क की नींव कथित तौर पर असलम चमड़ा ने रखी, जिसने 1988 में गांव-गांव भैंसों की खाल खरीदने से कारोबार शुरू किया और बाद में मृत मवेशी उठाने के ठेके हासिल कर लिए. समय के साथ नगर निगम में उसकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि कोई भी उसके खिलाफ टेंडर भरने की हिम्मत नहीं कर पाया.

निगम अधिकारियों से पूछताछ न होना एक बड़ा सवाल

असलम चमड़ा की गिरफ्तारी के बाद जांच अब नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच चुकी है. टेंडर फाइलों में शीर्ष अधिकारियों के हस्ताक्षर मिले हैं, लेकिन अब तक उनसे पूछताछ न होना एक बड़ा सवाल बना हुआ है. मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब 17 दिसंबर को 26 टन गौ-मांस की बरामदगी, विदेशी सप्लाई नेटवर्क के खुलासे और PPP मॉडल के तहत स्लॉटर हाउस सौंपे जाने के कुछ ही हफ्तों बाद संदिग्ध खेपों की जानकारी सामने आई.

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ये गंभीर आरोप भी लगे

इसके साथ ही रोहिंग्या प्रवासियों को बसाने, फर्जी दस्तावेज़ तैयार करने और स्थानीय लोगों की रोज़ी-रोटी छीनने जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं. दबाव तब और बढ़ गया जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस की शुरुआती रिपोर्ट को खारिज करते हुए जांच में घोर लापरवाही की बात कही.

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अब यह मामला सिर्फ गौ-वध या फर्जी लाइसेंस तक सीमित नहीं रहा. यह संस्थागत जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है और यह सवाल खड़ा कर रहा है कि भोपाल के सबसे संवेदनशील वन्य क्षेत्र में नियमों की अनदेखी आखिर किसके संरक्षण में की गई.

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