भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट ने ASI की रिपोर्ट पर मांगी आपत्तियां, सभी पक्षकारों को दो हफ्तों की दी मोहलत

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर सुनवाई करते हुए सभी पक्षकारों को अपनी आपत्तियां, राय, सुझाव और सिफारिशें पेश करने के लिए दो हफ्तों की मोहलत दी है.

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Bhojshala Case: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की इंदौर पीठ ने धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई, ASI) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर सोमवार को सभी पक्षकारों को अपनी आपत्तियां, राय, सुझाव और सिफारिशें पेश करने के लिए दो हफ्तों की मोहलत दी है. भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है.

यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है और इस एएसआई ने हाईकोर्ट के आदेश पर दो साल पहले विवादित परिसर का सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी को हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह विवादित परिसर के बारे में एएसआई द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट खोले.

रिपोर्ट पहले ही खुली

हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पाया कि यह रिपोर्ट पहले ही खोली जा चुकी है और इसकी प्रति पक्षकारों को प्रदान की भी जा चुकी है. अदालत ने रेखांकित किया कि पक्षकारों ने इस रिपोर्ट पर अब तक उनकी आपत्तियां, अभिमत, सुझाव और सिफारिशें अदालत के सामने पेश नहीं की हैं.

16 मार्च को अगली सुनवाई

युगल पीठ ने कहा,‘‘इस स्थिति के मद्देनजर पक्षकारों को इस रिपोर्ट पर उनकी आपत्तियां, अभिमत, सुझाव और सिफारिशें पेश करने के लिए दो हफ्ते की मोहलत दी जाती है.'' अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है.

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15 जुलाई को ASI ने पेश की थी रिपोर्ट

ASI ने 15 जुलाई 2024 को हाईकोर्ट में अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट पेश की थी. पक्षकारों के मुताबिक रिपोर्ट में संक्षिप्त निष्कर्षों के अध्याय में पुरातात्विक अवशेषों की वैज्ञानिक जांच के हवाले से कहा गया, ‘‘प्राप्त स्थापत्य अवशेषों, मूर्तिकला के टुकड़ों, साहित्यिक ग्रंथों वाले शिलालेखों की बड़ी शिलाओं, स्तंभों पर नागकर्णिका शिलालेख आदि से संकेत मिलता है कि इस स्थल पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से संबंधित एक विशाल संरचना विद्यमान थी. वैज्ञानिक जांच और जांच के दौरान प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर इस पहले से मौजूद संरचना को परमार काल का माना जा सकता है.''

प्राचीन मंदिरों के भागों से बनी वर्तमान संरचना

पक्षकारों के मुताबिक विस्तृत रिपोर्ट में आगे कहा गया,‘‘वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और पुरातात्विक उत्खनन, प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन और विश्लेषण, स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों के अध्ययन, कला और मूर्तिकला के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान संरचना प्राचीन मंदिरों के भागों से बनाई गई थी.''

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98 दिनों तक चला सर्वे

याचिकाकर्ता संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विनय जोशी ने संवाददाताओं को बताया कि एएसआई ने विवादित परिसर में 98 दिनों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद 10 खंडों में 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है. उन्होंने कहा,‘‘इस विस्तृत रिपोर्ट में परिसर में मिले सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों आदि का विस्तृत विवरण दिया गया है. हालांकि, इस परिसर की प्रकृति अदालत के अंतिम फैसले से तय होगी.''

विवादित परिसर की कमाल मौला मस्जिद में जुमे की नमाज अदा करने वाले तीन लोगों ने उच्च न्यायालय में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की ओर से दायर मुकदमे में हस्तक्षेप याचिका दायर की है.

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इनके वकील अशहर वारसी ने संवाददाताओं से कहा, 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस का मुकदमा विवादित परिसर के तथ्यों के बारे में है और इन तथ्यों की सत्यता के बारे में फैसला करने के लिए पहले दीवानी न्यायालय में सुनवाई होनी चाहिए. लिहाजा हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस का मुकदमा फिलहाल उच्च न्यायालय में चलने योग्य ही नहीं है.'

धार के ऐतिहासिक परिसर को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के मुताबिक हिंदुओं को इस परिसर में प्रत्येक मंगलवार पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार वहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है.