ढोल-नगाड़ों और डांस के साथ बुजुर्ग को दी गई अंतिम विदाई, नजारा देखकर दंग रह गए लोग

Special Funeral Rituals: मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले की जोबट तहसील के छोटी खट्टाली गांव में एक बुजुर्ग किशन सिंह मायडा का वृद्धावस्था में स्वाभाविक मौत हो गई. उनके पुत्र दूलेसिंह मायडा और रघु मायडा सहित पूरे परिवार और गांव के लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अंतिम यात्रा निकाली. अर्थी को डोली की तरह सजाया गया और गांव के लोग ढोलक की थाप पर नाचते-गाते मुक्तिधाम तक पहुंचे.

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Funeral Rituals: आमतौर पर मौत के बाद परिजन और रिश्तेदार रोते-बिलखते नजर आते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के अलीराजपुर (Alirajpur) जिले की जोबट तहसील के छोटी खट्टाली गांव में एक बुजुर्ग की मौत पर ऐसा नजारा दिखा, जिसे देखकर लोग दंग रह गए. दरअसल, छोटी खट्टाली गांव में एक बुजुर्ग को ऐसी अंतिम विदाई दी गई, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. यहां दिवंगत किशन सिंह मायडा के निधन के बाद शोक के बजाय सम्मान और जीवन उत्सव की भावना के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई. आदिवासी परंपरा के अनुसार ढोल-नगाड़ों, नृत्य और गीतों के बीच ग्रामीणों ने उन्हें विदा किया.

जानकारी के मुताबिक किशन सिंह मायडा का वृद्धावस्था में स्वाभाविक निधन हुआ. उनके पुत्र दूलेसिंह मायडा और रघु मायडा सहित पूरे परिवार और गांव के लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अंतिम यात्रा निकाली. अर्थी को डोली की तरह सजाया गया और गांव के लोग ढोलक की थाप पर नाचते-गाते मुक्तिधाम तक पहुंचे. अर्थी को कंधा देने वाले ग्रामीण भी परंपरा के अनुरूप थिरकते हुए नजर आए.

शोक नहीं, जीवन की पूर्णता का उत्सव

ग्रामीणों के अनुसार आदिवासी समाज में यदि किसी बुजुर्ग का निधन बिना लंबे कष्ट या बीमारी के होता है, तो उसे जीवन की पूर्णता माना जाता है. ऐसे अवसर पर अंतिम विदाई केवल शोक का प्रतीक नहीं होती, बल्कि उस व्यक्ति के जीवन, संघर्ष और योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम होती है. यही कारण है कि अंतिम यात्रा में मातम के बजाय संगीत और नृत्य का माहौल दिखाई दिया.

अर्थी के साथ रखी गई जीवन की प्रतीक वस्तुएं

अंतिम यात्रा के दौरान अर्थी के साथ अनाज, कुल्हाड़ी, तांबे के बर्तन और आभूषण भी रखे गए. आदिवासी मान्यताओं के अनुसार ये वस्तुएं दिवंगत व्यक्ति के श्रम, जीवन संघर्ष और परिवार के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती हैं. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है.

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ग्राम छोटी खट्टाली में निभाई गई यह परंपरा अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अंतिम संस्कार केवल एक रस्म नहीं, बल्कि समुदाय की एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और बुजुर्गों के प्रति सम्मान का प्रतीक है. परिजनों ने भी बताया कि इस तरह की विदाई दिवंगत आत्मा को सम्मान पूर्वक विदा करने की परंपरा है.

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