भोपाल में 115 साल पहले हुई थी दशहरा मनाने की शुरुआत, जानें छोला मंदिर और चल समारोह की कहानी

मंदिर में समाज की समिति की ओर से नवाबी शासन काल में ही राम दल का गठन कर लिया गया था इसलिए दशहरा मनाए जाने से पहले समाज के लोग विजयादशमी पर झंडा लेकर छोला मंदिर चढ़ाने जाते थे. यह काम चोरी-छिपे किया जाता था.

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भोपाल में दशहरा मनाए जानें का इतिहास (प्रतीकात्मक फोटो)

Dussehra 2023 : बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है. दशहरे के दिन भगवान राम (Lord Ram) ने रावण का वध करके असत्य पर सत्य की जीत का परचम लहराया था. राजधानी भोपाल (Bhopal) में सबसे बड़े त्योहार दशहरे (Dussehra) की तैयारियां पूरी की जा चुकी हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं, भोपाल में दशहरा मनाए जाने का इतिहास 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है. आइए जानते हैं इसके पीछे की कहानी...

70 साल पहले कमाली मंदिर में मना था दशहरा

नवाबी रियासत के दौर में ही दशहरा की शुरुआत हो चुकी थी. राजधानी भोपाल में करीब 70 साल पहले कमाली मंदिर परिसर में दशहरा मनाया जाता था. उस समय पुट्ठा मिल हमीदिया रोड के आगे जंगल हुआ करता था. तब स्वर्णकार समाज के मंदिर से रामदल तैयार होकर छोला दशहरा मैदान पहुंचने लगा और फिर दशहरा यानी विजयादशमी के त्योहार को मनाने की शुरुआत हुई. पहले हिंदू त्योहार समिति थी जो बाद में 70 के दशक में हिन्दू उत्सव समिति बनी.

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दशहरा की शुरुआत 115 साल पहले हुई

राजधानी भोपाल में दशहरा पर्व मनाने की शुरुआत 115 साल से भी अधिक समय पहले हुई थी. छोला दशहरा मैदान के लिए निकलने वाले चल समारोह में शामिल होने वालों को भगवान राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न के स्वरूप सजाया जाता, जिसकी जिम्मेदारी स्वर्णकार समाज के बांके बिहारी मंदिर समिति की होती.

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नवाबी शासन काल में छिपकर चढ़ाते थे झंडा

मंदिर में समाज की समिति की ओर से नवाबी शासन काल में ही राम दल का गठन कर लिया गया था इसलिए दशहरा मनाए जाने से पहले समाज के लोग विजयादशमी पर झंडा लेकर छोला मंदिर चढ़ाने जाते थे. यह काम चोरी-छिपे किया जाता था लेकिन कुछ साल बाद भोपाल के नवाबों को इस बात का पता चल गया.

भोपाल के नवाबों को लग गई थी भनक

जब भोपाल के नवाबों को इस बात की भनक लगी तब उन्होंने स्वर्णकार समाज के लोगों को बुलाया और जानकारी हासिल की. इसके बाद उन्होंने छोला मैदान पर दशहरा मनाने की अनुमति दे दी. तब से ही भोपाल में चल समारोह की शुरुआत हुई. पहले छोला मैदान शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र में माना जाता था इसलिए घोड़ा नक्कास स्थित कमाली मंदिर के पास रावण दहन हुआ करता था.

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1975 से निकल रहा है चल समारोह

साल 1975 में और उससे पहले भी कई बार मंदिर में राम दल समिति ने कई आयोजन किए. इनमें भगवान के स्वरूप को बेहद खूबसूरत तरीके से सजाया जाता था. कई साल से चली आ रही यह परंपरा भोपाल के दशहरे को एक अनोखा रूप देती है. पुराने भोपाल में निकाले जाने वाले चल समारोह में सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल होते हैं और बड़े उत्साह से इस दिन का इंतजार करते हैं.

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