शिक्षा को बच्चों के बेहतर भविष्य की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, लेकिन बैतूल के दनोरा गांव में यह नींव खुद जर्जर भवन के सहारे खड़ी नजर आती है. जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय में बच्चे हर दिन डर और असुविधाओं के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
बरसात के मौसम में हालात और खराब हो जाते हैं. स्कूल परिसर में पानी भर जाता है, छत से पानी टपकता है और कई जगहों पर भवन की हालत इतनी खराब है कि बच्चों व शिक्षकों को हमेशा किसी हादसे की आशंका बनी रहती है. सबसे हैरानी की बात यह है कि एक ही कमरे में बच्चों की पढ़ाई भी होती है और वहीं मध्याह्न भोजन भी तैयार किया जाता है.
31 साल पुराने भवन की बिगड़ी हालत
दनोरा गांव का यह स्कूल भवन वर्ष 1995 में बनाया गया था. समय के साथ भवन की हालत लगातार खराब होती गई, लेकिन आवश्यक मरम्मत नहीं हो सकी. स्कूल में कुल आठ कमरे हैं, लेकिन इनमें से केवल चार कमरे ही उपयोग के योग्य बचे हैं. इन्हीं चार कमरों में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की आठ कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है. सीमित संसाधनों के बीच शिक्षक बच्चों की पढ़ाई जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं.

एक कमरे में पढ़ाई और मिड-डे मील
स्कूल में कमरों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक कमरे का उपयोग दो अलग-अलग कामों के लिए किया जा रहा है. इसी कमरे में बच्चों की कक्षा भी लगती है और यहीं उनके लिए मध्याह्न भोजन भी तैयार किया जाता है. इससे पढ़ाई का माहौल प्रभावित होने के साथ-साथ व्यवस्था संबंधी कई चुनौतियां भी सामने आती हैं.
बरसात में बढ़ जाती है परेशानी
मानसून के दौरान स्कूल की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं. जर्जर छत से पानी टपकने लगता है और दीवारों में सीलन भर जाती है. विद्यालय परिसर में पानी जमा होने से बच्चों को करीब डेढ़ फीट पानी से होकर कक्षाओं तक पहुंचना पड़ता है. कई बार जलभराव की वजह से स्कूल परिसर की स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.
बच्चों में बना रहता है डर
स्कूल की जर्जर हालत के कारण बच्चों के मन में हमेशा भय बना रहता है. कक्षा में बैठने के दौरान उन्हें छत या प्लास्टर गिरने की आशंका सताती रहती है. वहीं नमी और अस्वच्छ वातावरण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है. अभिभावकों की चिंता भी इसी वजह से लगातार बढ़ रही है.
शिक्षक और ग्रामीण मिलकर संभाल रहे व्यवस्था
स्कूल परिसर में जब पानी भर जाता है, तब शिक्षक और गांव के लोग मिलकर हालात संभालने की कोशिश करते हैं. जल निकासी की व्यवस्था करने से लेकर बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने तक, ग्रामीण और स्कूल स्टाफ अपनी ओर से हर संभव प्रयास करते हैं ताकि पढ़ाई बाधित न हो. हालांकि यह केवल अस्थायी समाधान है और स्थायी व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है.
डेढ़ साल से हो रही मांग, नहीं मिला समाधान
ग्रामीणों के अनुसार, शाला विकास समिति के अध्यक्ष पिछले करीब डेढ़ वर्ष से जिला प्रशासन के सामने स्कूल भवन की मरम्मत और जीर्णोद्धार की मांग उठा रहे हैं. उनका कहना है कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.