Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले में किसानों की खाद की परेशानी अब लाइन से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच गई है. उर्वरक वितरण को पारदर्शी और आसान बनाने के लिए लागू की गई ई-टोकन व्यवस्था जमीनी स्तर पर किसानों के लिए नई चुनौती बनती नजर आ रही है. डिजिटल साक्षरता की कमी, फार्मर आईडी की बाधा और जटिल ऑनलाइन प्रक्रिया के चलते कई किसान समय पर खाद नहीं खरीद पा रहे हैं, जिससे रबी फसल पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं.
लाइन खत्म हुई, लेकिन समस्या खत्म नहीं
ई-टोकन व्यवस्था लागू होने से पहले किसानों को उर्वरक वितरण केंद्रों पर एक-दो दिन तक लंबी लाइन में लगना पड़ता था. इसी परेशानी को दूर करने और व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से सरकार ने 10 जनवरी से ई-टोकन आधारित उर्वरक वितरण प्रणाली लागू की.
आगर मालवा जिले में अब वितरण केंद्रों पर लाइनें तो लगभग समाप्त हो गई हैं, लेकिन किसानों की दिक्कतें खत्म नहीं हुई हैं. कारण यह है कि बड़ी संख्या में किसान डिजिटल प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं.
एंड्रायड मोबाइल और फार्मर आईडी बनी बड़ी बाधा
ई-टोकन बनाने के लिए किसान के पास एंड्रायड मोबाइल होना जरूरी है. जिले के कई किसानों के पास या तो स्मार्टफोन नहीं है, और जिनके पास है वे केवल कॉल करने या सीमित डिजिटल लेनदेन तक ही उसका उपयोग जानते हैं.
ऐसे में किसान गांव और कस्बों में संचालित ऑनलाइन सेंटरों पर पहुंच रहे हैं. वहां पता चलता है कि उनकी फार्मर आईडी ही नहीं बनी है. फार्मर आईडी के लिए पावती, आधार कार्ड और आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर अनिवार्य है. इन दस्तावेजों को ऑनलाइन अपलोड करने में समय लगता है और कई बार तकनीकी दिक्कतें भी सामने आती हैं.
स्टॉक रहेगा तभी बनेगा ई-टोकन
ई-टोकन तभी जनरेट हो पा रहा है, जब संबंधित वितरण केंद्र पर यूरिया की आवश्यक किस्म का स्टॉक उपलब्ध हो. यदि स्टॉक नहीं है, तो किसान का आवेदन भी आगे नहीं बढ़ पाता. इससे किसान को बार-बार ऑनलाइन सेंटर और वितरण केंद्र के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.
सोसायटी सदस्यता ने बढ़ाई उलझन
ई-टोकन आवेदन प्रक्रिया में किसान से यह भी पूछा जा रहा है कि वह ग्रामीण कृषि सहकारी संस्था का सदस्य है या नहीं. आगर मालवा में कई किसान सोसायटी के डिफॉल्टर हैं या पहले ही सोसायटी से उर्वरक ले चुके हैं.
ऐसे किसान, जिन्हें रबी फसल के दौरान थोड़ी मात्रा में खाद की आवश्यकता है, वे नगद भुगतान कर सरकारी दर पर खाद लेना चाहते हैं. इसी कारण कई किसान सोसायटी के सदस्य होने के बावजूद आवेदन में स्वयं को गैर-सदस्य दर्ज कर रहे हैं.
प्रशासन कर रहा प्रचार, फिर भी भटक रहे किसान
जिले में कृषि वर्ष 2026 का शुभारंभ 11 जनवरी को हुआ. कृषि विभाग द्वारा चार प्रचार रथ तैयार किए गए हैं, जिनके माध्यम से ई-टोकन उर्वरक वितरण व्यवस्था की जानकारी गांव-गांव दी जा रही है. चारों विकासखंडों में वरिष्ठ कृषि अधिकारी कार्यालयों में कंट्रोल रूम भी स्थापित किए गए हैं. इसके बावजूद किसान ई-टोकन बनवाने के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं.
इसकी मुख्य वजह यह है कि जिला ग्रामीण प्रधान होते हुए भी कस्बाई प्रकृति का है. किसान एंड्रायड मोबाइल का सीमित उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन कम शिक्षित और कम जागरूक होने के कारण डिजिटल व्यवस्था का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं.
किसान संगठन ने उठाई मांग
भारतीय किसान संघ के जिला अध्यक्ष रामनारायण तेजरा ने NDTV से फोन पर चर्चा में कहा कि ई-टोकन उर्वरक व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए उर्वरक वितरण केंद्रों पर ही फार्मर आईडी और ई-टोकन बनाने की निःशुल्क व्यवस्था होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जिस तरह SIR का काम डोर-टू-डोर अभियान के तहत किया गया, उसी तरह फार्मर आईडी के लिए भी अभियान चलाया जाना चाहिए. पट्टे की जमीन पर खेती करने वाले किसानों के लिए नगद खाद खरीदी हेतु अलग टोकन व्यवस्था की भी जरूरत है.
कृषि विभाग का जवाब
कृषि विभाग के उपसंचालक विजय चौरसिया ने कहा कि जिन किसानों के पास पट्टे या संस्था की जमीन है, वे टोकन आवेदन के समय एसडीएम कार्यालय से पट्टे का प्रमाणीकरण कराकर फार्मर आईडी बनवा सकते हैं. उन्होंने कहा कि ई-टोकन प्रणाली से उर्वरक वितरण में पारदर्शिता आएगी और किसानों को सही समय पर आवश्यक मात्रा में खाद उपलब्ध हो सकेगी. किसानों को सरकार की इस व्यवस्था का लाभ उठाना चाहिए.
जमीनी हकीकत
तमाम दावों के बीच सच्चाई यह है कि ई-टोकन व्यवस्था में किसानों को ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज अपलोड और प्रक्रिया पूरी करने में समय के साथ-साथ पैसा भी खर्च करना पड़ रहा है. सरकार द्वारा सौ प्रतिशत फार्मर आईडी बनाने का लक्ष्य दिए जाने के बावजूद आगर मालवा जिले में बड़ी संख्या में किसानों की फार्मर आईडी अभी तक नहीं बन पाई है. ऐसे में जिला प्रशासन को किसानों के लिए डिजिटल साक्षरता बढ़ाने के ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे.