Jainism: जैन धर्म सिखाता है जीवन जीने की सही राह, जानिए इन 5 सिद्धांतों के बारे में

आज भाग दौर भरी जिंदगी में आज हर कोई मानसिक शांति पाने के लिए विभिन्न तरीकों को अपना रहे हैं. जैन धर्म में जीवन जीने की सही राह को दिखाया गया है.

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जैन धर्म में जीवन जीने की सही राह को दिखाया गया है

Jainism: आज के समय में हर कोई शारीरिक परेशानियों से ज़्यादा मानसिक समस्याओं (Mental Health) से जूझ रहा है. सोशल मीडिया के बढ़ते दौर में लोग जीवन जीने के सही ढंग को अपना नहीं पा रहे हैं. चलिए हम आपको जैन धर्म (Jainism) के पांच ऐसे सिद्धान्तों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप जीवन की कठिनाइयों (Life problem) से लड़ सकते हैं और एक अच्छा जीवन जी सकते हैं.

भाग दौर भरी जिंदगी में आज हर कोई मानसिक शांति पाने के लिए विभिन्न तरीकों को अपना रहे हैं. लेकिन जैन धर्म में जीवन जीने की सही राह को दिखाया गया है, ये सिद्धांत जैन धर्म के संस्थापक और जैनों के 24वीं तीर्थंकर (Jain Tirthankara) महावीर भगवान (Lord Mahaveer) ने दिए हैं. जिन्हें अपनाकर आप भी सरल और सुखमयी जीवन जी सकते हैं.. आइए जानते हैं उन 5 सिद्धांतों के बारे में.

अहिंसा
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है अहिंसा, जिसका अर्थ होता है 'हिंसा रहित' होकर रहना यानी किसी भी जीव की हिंसा न करना, जीवन का सार भी इसी से जुड़ा हुआ है जो लोग हिंसात्मक प्रवत्ति के होते हैं वे मानसिक रूप से परेशान होते रहते हैं इसीलिए हमें अहिंसा की राह को अपनाना चाहिए.

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सत्य
सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं, हमने हमेशा यह सुना है कि सत्य की हमेशा विजय होती है. जो कोई सत्य यानी सच्चाई के मार्ग पर चलता है उसे जीवन में मानसिक रूप से कोई परेशानी नहीं होती है. झूठ, फ़रेब, धोखा, बेईमानी जैसे असामाजिक चीज़ों से बचकर हमेशा सच्चाई के पथ पर चलना चाहिए.

अस्तेय 
अस्तेय का शाब्दिक अर्थ है चोरी न करना, जैन धर्म का प्रमुख सिद्धांत कहे जाने वाले इस शब्द में जीवन का सार छुपा है. अस्तेय का व्यापक अर्थ हैं- चोरी न करना. साथ ही मन, वचन और कर्म में भी किसी दूसरे की संपत्ति को चुराने के भाव न रखना बताया गया है. 

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अपरिग्रह
अपरिग्रह ये विचार मुख्य रूप से जैन और हिंदू धर्म के राजयोग का हिस्सा है. जैन धर्म के अनुसार अपरिग्रह में आपके जीवन के आधार बताए गए हैं. अपरिग्रह करने से मृत्यु काल में शरीर के कष्टों से मानव बच जाता है वहीं सांसारिक जीवन में रहकर अपरिग्रह का पालन करने से शारीरिक और मानसिक रूप से संतुष्टि मिलती है.

ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से बना है. ब्रह्म और चर्य प्रमुख का अर्थ है शुद्धात्मा में रहना. परमात्मा से विचार जोड़कर सदा उसी का ध्यान रखना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है न सिर्फ़ जैन धर्म में बल्कि महाभारत के रचयिता व्यास जी ने भी ब्रह्मचर्य के कई लाभ बताए हैं.

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