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This Article is From Jul 10, 2023

झाबुआ : 'कड़कनाथ' को मिला जीआई टैग, बांस से बने प्रोडक्ट भी हैं दुनियाभर में फेमस

झाबुआ शहर का अपना एक रोचक इतिहास तो है ही, लेकिन दुनियाभर में पहचान मिली एक मुर्गे के नाम पर. मुर्गों की इस प्रजाति को कड़कनाथ कहते हैं. जिसका स्वाद और टेक्शचर खाने के शौकीनों को अट्रेक्ट करता रहा है.

झाबुआ : 'कड़कनाथ' को मिला जीआई टैग, बांस से बने प्रोडक्ट भी हैं दुनियाभर में फेमस

मध्यप्रदेश के मालवांचल में हर तरह का फ्लेवर मौजूद है. यहां तेज रफ्तार से भागता और चकाचौंध करता शहर इंदौर है तो धार्मिक नगरी उज्जैन भी है. इस अंचल में एक शहर, एक जिला झाबुआ भी है, जो आज भी अपनी पुराने फ्लेवर को संजो कर रखने में कामयाब रहा है. इस शहर का अपना एक रोचक इतिहास तो है ही. लेकिन इसे दुनियाभर में पहचान मिली एक मुर्गे के नाम पर. मुर्गों की इस प्रजाति को कड़कनाथ कहते हैं, जिसका स्वाद और टेक्शचर खाने के शौकीनों को अट्रेक्ट करता रहा है. कड़कनाथ के अलावा बांस से बने उत्पाद भी झाबुआ के कई घरों में आज भी जीवन यापन का जरिया बने हुए हैं.

झाबुआ का इतिहास

  • कुदरती हरियाली के बीच स्थित झाबुआ पर अलग अलग राजाओं का राज रहा है. एक समय में ये शहर भाग भगोर रियासत हुआ करता था. इस रियासत के राजा थे कसुमर. इन्हें आज भी झाबुआ के कई हिस्सों में पूजा जाता है.
  • राजा शुक भील ने यहां 1300 इस्वी में राज किया. राजा शुक भील ने धोलपुर राजपूतों के साथ मिलकर गुजरात के राजा को भी हरा दिया था. उनके वीरता के ऐसे कई किस्से मशहूर हैं.
  • झाबुआ शहर को ये नाम मिला राजा झब्बू नायक के नाम पर. झब्बू नायक ने झाबुआ पर सन 15 सौ के आसपास राज किया. इसके बाद जोधा राठौर राजवंश ने झाबुआ पर हमला किया. झब्बू नायक की हार हुई और झाबुआ जोधा राठौर राजवंश की जागीर बन गया. 
  • 15 जून 1948 तक झाबुआ पर राजाओं का राज रहा. इसके बाद झाबुआ भी ऑफिशियली भारतीय संघ में शामिल हुआ. 1956 में इस रियासत का विलय मध्यप्रदेश में हो गया.

कड़कनाथ से मिली पहचान

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झाबुआ की पहचान हैं कड़कनाथ मुर्गे

कड़कनाथ मुर्गे का नाम लें तो झाबुआ का नाम सबसे पहले याद आता है. काले मांस और गाढ़े रंग के खून वाला ये मुर्गा खाने में बेहद लजीज होता है. जिसके स्वाद के मुरीद देश से लेकर विदेश तक हैं. ज्यादा मांग की वजह से कड़कनाथ की प्रजाति धीरे धीरे कम हो रही थी. लेकिन इसे जीआई टैग मिलने के बाद कड़कनाथ के संरक्षण पर तेजी से काम शुरू हुआ. और , अब स्थिति पहले से काफी बेहतर है.

बांस के खिलौनों ने दी मजबूती

देश के ढाई सौ सबसे पिछड़े जिलों में शामिल झाबुआ में बांस की कलाकृत्तियां भी खूब बनाई जाती हैं. महिलाएं बांस से गुड़िया, गहने और कई अन्य तरह की कलाकृतियां बनाती हैं. झाबुआ के अधिकांश सेल्फ हेल्प ग्रुप औऱ महिला समूह भी इस काम को बढ़ावा देते हैं, जिससे कई घरों का जीवनयापन होता है.

झाबुआ ज़िले पर एक नजर

  •  विधानसभा क्षेत्र- 3
  •  (झाबुआ, थांदला और पेटलावद)
  • जनसंख्या1,025,048
  • लिंग अनुपात (1000 पुरुष प्रति महिला)990
  • साक्षरता दर-43.3
  •  विधानसभा क्षेत्र- 3
  •  तहसील- 6
  •  पंचायतें -69
  •  गांव- 890
  •  ग्राम पंचायत -375

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