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This Article is From Jan 18, 2026

कागजों में चमक रहा है 43 लाख का मिनी स्टेडियम, हकीकत में बन चुका है खंडहर, लगों में बढ़ा आक्रोश

जिस मैदान को गांव के बच्चों और युवाओं के लिए खेल का केंद्र बनना था, वह आज व्यवस्था, झाड़ियों और टूटी सुविधाओं का गढ़ बनकर रह गया है. ग्रामीणों का कहना है कि स्टेडियम अब सिर्फ फाइलों में मौजूद है, स्टेडियम के नाम पर जमीन पर तो खंडहर है. 

कागजों में चमक रहा है 43 लाख का मिनी स्टेडियम, हकीकत में बन चुका है खंडहर,  लगों में बढ़ा आक्रोश

छत्तीसगढ़ के एमसीबी जिले के खड़गवां विकासखंड के ग्राम पंचायत जिल्दा में 43.92 लाख रुपये की लागत से बनाया गया मिनी स्टेडियम आज बदहाली की कड़वी तस्वीर पेश कर रहा है. 43.92 लाख रुपए की राशि से तैयार हुआ यह स्टेडियम अब रखरखाव के अभाव और विभागीय लापरवाही के चलते पूरी तरह जर्जर हो चुका है.

जिस मैदान को गांव के बच्चों और युवाओं के लिए खेल का केंद्र बनना था, वह आज व्यवस्था, झाड़ियों और टूटी सुविधाओं का गढ़ बनकर रह गया है. ग्रामीणों का कहना है कि स्टेडियम अब सिर्फ फाइलों में मौजूद है, स्टेडियम के नाम पर जमीन पर तो खंडहर है. 

मुख्य द्वार भी अव्यवस्था का शिकार

स्टेडियम की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके मुख्य द्वार के सामने वाहन खड़े रहते हैं. इससे प्रवेश मार्ग तक बाधित हो जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि जब किसी सार्वजनिक खेल परिसर का गेट ही जाम हो जाए, तो व्यवस्था का स्तर खुद-ब-खुद सामने आ जाता है.

मैदान उबड़-खाबड़, प्रैक्टिस भी मुश्किल

स्टेडियम के अंदर कदम रखते ही ऊंची झाड़ियां, ऊबड़-खाबड़ जमीन और उजाड़ माहौल इस बात की गवाही देता है कि निर्माण के बाद इसे लगभग लावारिस छोड़ दिया गया. मैदान का समतलीकरण नहीं होने की वजह से खिलाड़ी ठीक से दौड़ भी नहीं पा रहे हैं. ऐसे में खेल प्रतियोगिता आयोजित करना तो दूर, यहां अभ्यास कर पाना भी चुनौती बन चुका है.

क्षतिग्रस्त टंकियां बनीं बदहाली की पहचान

स्टेडियम में टॉयलेट बनाए गए थे और पानी उपलब्ध कराने के लिए छत पर टंकियां भी लगाई गई थी. पाइप फिटिंग भी कराई गई थी, ताकि परिसर में आधारभूत सुविधा बनी रहे. लेकिन आज स्थिति यह है कि टंकियां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, पाइप लाइन बेकार पड़े हैं और पानी की कोई व्यवस्था नहीं बची है. ग्रामीणों के मुताबिक, बुनियादी सुविधा टूटने के बाद यह स्टेडियम धीरे-धीरे पूरी तरह बेकार हो चुका है. 

NDTV टीम के सामने छलका ग्रामीणों का दर्द

एनडीटीवी की टीम जब मौके पर पहुंची और लोगों से बातचीत की, तो ग्रामीणों की नाराजगी साफ दिखाई दी. नाराज ग्रामीण रामलाल ने बताया कि स्टेडियम अब खेलने लायक नहीं बचा है. पूरा मैदान झाड़ियों से पटा है. विभाग की लापरवाही ने इसे जंगल में बदल दिया है, जिससे बच्चे सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं. हालत ये है कि अब स्टेडियम में कदम रखना भी मुश्किल बन चुका है. वहीं, स्थानीय निवासी यूपी सिंह का कहना है कि इस बदहाली का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को हो रहा है. उनका कहना है कि गाड़ियों और ऊंची-नीची जमीन इतनी ज्यादा है कि बच्चे स्टेडियम में कदम तक नहीं रख पाते. मजबूरी में स्कूल की बाउंड्री के अंदर ही खेलने को मजबूर हो रहे हैं. 

बच्चों की पहुंच से बाहर हुआ स्टेडियम

ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्टेडियम का उद्देश्य बच्चों को खेल से जोड़ना था, वह आज बच्चों की पहुंच से बाहर हो चुका है. सरपंच ने भी बदहाली की बात मानते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. ग्राम पंचायत जिल्दा की सरपंच नंदेश्वरी सिंह ने भी स्वीकार किया कि स्टेडियम बच्चों और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया था. गांव में प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं और खेल सामग्री भी उपलब्ध कराई गई है, लेकिन स्टेडियम की बदहाली उनके सपनों पर पानी फेर रहा है. सरपंच का कहना है कि मैदान के समतलीकरण की मांग कई बार की गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

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जिल्दा मिनी स्टेडियम की हालत यह साफ बताती है कि सिर्फ निर्माण करा देने से विकास नहीं होता. विकास तब होता है, जब कि भी योजना या निर्माण की उचित देखरेख हो, नियमित रखरखाव हो और जिम्मेदार विभाग जवाबदेह हो.  इन सबके अभाव की वजह से आज स्टेडियम कागजों में तो चमक रहा है, लेकिन जमीन पर खंडहर बन चुका है. गांव के खिलाड़ी और युवा अभ्यास के लिए जगह तलाशते भटक रहे हैं, लेकिन विभागीय उदासीनता उनकी उम्मीदों को कमजोर कर रही है.

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