ड्रम बजाते, गाना गाते, डांस करते और कैरम खेलते हैं बच्चे, CG के उस सरकारी स्कूल की कहानी जहां पढ़ाई जा रही रामायण-गीता

कभी नक्सल हिंसा के लिए पहचाने जाने वाला छत्तीसगढ़ अब शिक्षा के क्षेत्र में नई मिसाल गढ़ रहा है. एमसीबी जिले के वनांचल क्षेत्र में स्थित शासकीय प्राथमिक शाला सकड़ा ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसकी जमकर चर्चा हो रही है. नई पहल से  यह सरकारी स्कूल निजी संस्थानों को भी पीछे छोड़ रहा है.

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Chhattisgarh government school: मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले का शासकीय प्राथमिक शाला सकड़ा चर्चा में.

कभी नक्सलियों के लिए जाने जाना वाला छत्तीसगढ़ अब अपनी एक अलग पहचान बना रहा है. प्रदेश में नक्सली का दौर खत्म होने की ओर है और विकास दस्तक दे चुका हैं. जहां कभी पढ़ाने पर शिक्षक को मार दिया जाता हो अब उसी राज्य से हैरान कर देने वाले सरकारी स्कूल की तस्वीर सामने आई है. पहली नजर में स्कूल की कहानी यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या यह सच में सरकारी स्कूल ही है. लेकिन यह पूरी तरह सच हैं. 

हम बात कर रहे हैं मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी जिला मुख्यालय) से करीब 50 किलोमीटर दूर अंतिम छोर पर स्थित शासकीय प्राथमिक शाला सकड़ा की, जो अपनी     अलग पहचान के कारण पूरे इलाके में ही नहीं, जिले में भी चर्चा हैं. कठिन भौगोलिक परिस्थिति, सीमित संसाधन और वनांचल क्षेत्र में होने के बाद भी अपने नवाचारों के कारण यह स्कूल बड़े प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ते हुए एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रहा है. आइए, जानते हैं एमसीबी जिले के इस स्कूल की कहानी....  

स्कूल के बच्चे बजा रहे ड्रम

दरअसल, इस स्कूल में एक ई-रिक्शा है, जिसे बच्चों के लिए निःशुल्क चलाया जाता है. जो बच्चे पहले 2-3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल आते थे अब वे इसी से स्कूल आ रहे हैं. एक सम्मान समारोह में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने आग्रह करने पर विद्यालय को यह ई-रिक्शा भेंट में किया था. जो आज बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने में बड़ा संसाधन बन गया है. दूसरी खास बात यह है कि विद्यालय में हर सुबह वाद्ययंत्रों के साथ प्रार्थना होती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ कला की शिक्षा भी दी जाती है. कक्षा 1 से 5 तक हर साल लगभग 20 बच्चे स्कूल में ड्रम बजाना सीख लेते हैं, करीब 10 बच्चे सुर-लय के साथ भजन, गीत और कविताएं गाने का हुनर सीखते हैं.  

अंग्रेजी के लिए ऑडियो डिवाइस का उपयोग 

इसके अलावा कक्षा 1-2 के बच्चों के मौखिक भाषा विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है. खेल के माध्यम से उन्हें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है. अंग्रेजी भाषा सिखाने के लिए बच्चें को स्टेप अप फॉर इंडिया की ओर से मिले ऑडियो डिवाइस का उपयोग किया जा रहा है, जिससे बच्चे अंग्रेजी केू उच्चारण और बातचीत में निपुण हो रहे हैं. गणित जैसे कठिन विषय को भी यहां गतिविधि आधारित शिक्षा के माध्यम से आसान बनाया जा रहा है. बच्चे कक्षा के बाहर खेत की क्यारियों में सब्जियां उगाते हुए भिन्न, परिमाप, क्षेत्रफल जैसे कठिन अध्यायों को सहजता से सीख रहे हैं. इससे वे गणितीय परिस्थितियों को समझकर उनका व्यावहारिक समाधान भी ढूंढने लगे हैं. 

कमजोर बच्चों के लिए FLN कक्ष बनाया  

स्कूल में पढ़ने वाले जिन बच्चों की सीखने की गति धीमी है, उनके लिए FLN कक्ष विकसित किया गया है. सांस्कृतिक मंच में बने इस कक्ष में मौजूद सामग्री के आधार पर बच्चे एक-दूसरे को सीखने में मदद करते हैं. यहां वे ज्यामितीय आकृतियां, पैटर्न, आंकड़े और सरल शब्द पढ़ना सीखते हैं. संस्कृति संरक्षण की दिशा में भी विद्यालय ने बड़ा कदम उठाया है. गांव की लोक संस्कृति शैला नृत्य, जो विलुप्त होने की कगार पर है, उसे नन्हे बच्चों को सिखाया जा रहा है. छेरछेरा पर्व पर बच्चे गांव-गांव जाकर पारंपरिक शैला नृत्य प्रस्तुत करते हैं, जिससे स्थानीय परंपरा फिर से जीवित हो रही है.

बच्चे पढ़ रहे रामायण और गीता  

  • AI के दौर में बच्चों को स्कूल में रामायण और गीता जैसे शास्त्रों को पढ़ाया और समझाया जा रहा है. स्कूल के बच्चे प्रदेश के विभिन्न जिलों में जाकर रामायण गान और देवी जागरण भी कर रहे हैं. NDTV से बात करते हुए स्कूल की कक्षा पांचवीं की छात्रा नेहा सिंह बड़े उत्साह से रामायण की चौपाई सुनाती है- "सुनत बचनस् पुनि मारन धावा, मयतनया कहि नीति बुझावा. कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई, सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई".
  • NDTV से बात करते एक और छात्रा जयंती बताती हैं कि स्कूल आना अब बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि ई-रिक्शा होने से पैदल नहीं चलना पड़ता. जल्दी से स्कूल आ जाते हैं. स्कूल में पढ़ाई करना भी अच्छा लगता है. कक्षा चौथी के छात्र महेश ने बताया कि वह शैला नृत्य सीख रहे हैं, पहले उनके पापा भी यह करते थे, लेकिन अब देखने को नहीं मिलता, इसलिए वे खुद इसे सीखना चाहते हैं. 

22 शादियों में एक भी पेड़ नहीं कटा  

स्कूल के सहायक शिक्षक रुद्र प्रताप सिंह राणा बताते हैं कि बच्चों को यह करते हुए देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मैं अपने सपने पूरे कर रहा हूं. निजी विद्यालय में पढ़ते समय वे भी चाहते थे कि ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लें, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. अब वे अपने विद्यालय के बच्चों को ऐसा करा पा रहे हैं, इसका सुकून हैं. शिक्षक राणा बताते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बच्चों के पांच क्षेत्रों के विकास की बात करती है. विद्यालय में हर गतिविधि बच्चों को कक्षा के बाहर बेहतर सीखने का अवसर देती है. उन्होंने बताया कि लोक संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण बचाव की पहल भी उन्होंने की है. गांव में शादियों में बड़े पेड़ काटे जाते थे, इसलिए विद्यालय ने निवेदन किया कि पेड़ न काटें, विद्यालय से निःशुल्क टेंट ले जाएं. इसका नतीजा यह हुआ कि 22 शादियों में एक भी पेड़ नहीं काटा गया, लोग विद्यालय के टेंट इस्तेमाल कर रहे हैं.

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कोराना काल में भी बंद नहीं रहा स्कूल  

शिक्षक रुद्र प्रताप सिंह राणा कहते हैं कि कोराना काल में भी हमारा विद्यालय बंद नहीं रहा. वे हर वार्ड, गली, चौराहे पर छतरी लेकर बच्चों के पास जाते थे और उन्हें पढ़ाते थे, ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो. वे कहते हैं मेरा उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं था, यही चाहता हूं कि मेरे बच्चे पढ़ाई से जुड़े रहें. आज हमारा स्कूल न सिर्फ शिक्षा का मंदिर है, बल्कि संस्कृति, नवाचार, अनुशासन का उदाहरण बन चुकी है.

अब बच्चों को स्कूल अच्छा लगता हैं  

स्थानीय ग्रामीण मनोहर सिंह बताते हैं कि बच्चे शैला सीखकर गांव-गांव जाकर छेरछेरा त्योहार में नाचते हैं. बच्चे अंग्रेजी पढ़ना और बोलना सीख रहे हैं. उन्हें स्कूल आना अच्छा लगता है. हम भी यही चाहते हैं कि बच्चे पढ़-लिखकर कुछ अच्छा करें.   

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