Iran US Israel War: ईरान और अमेरिका / इजरायल के बीच युद्ध जारी हैं. दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका हैं. एक दूसरे पर जबर्दस्त बमबारी हो रही हैं. विशेषतः अमेरिका, ईरान पर भयानक और विनाशक बम बरसा रहा हैं. ऐसे में, मैं खोज रहा था, ईरान के जुंदिशापुर के क्या हाल हैं? सौभाग्य से जुंदिशापुर _(ईरान में वर्तमान समय में इसका आधिकारिक नाम - Gundishapur)_, अभी बचा हुआ हैं. सुरक्षित हैं. जिनेवा संधि / सम्मेलन (Geneva Convention) के अनुसार, युद्ध के प्रसंग में किसी भी देश के पुरातत्व महत्व के स्थान पर बमबारी करना, अपराध माना गया हैं. उस पर, जुंदिशापुर तो यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारक हैं.
जुंदिशापुर, ईरान के 31 राज्यों में से एक, खुजेस्तान में हैं. ईरान के बिल्कुल दक्षिण-पश्चिम में, पर्शियन गल्फ से लगा हुआ. यूनेस्को के संरक्षण में हैं.
जुंदिशापुर का इतना महत्व क्यों?
जुंदिशापुर ऐतिहासिक महत्व का स्थान हैं. किसी जमाने में यहां विश्वविद्यालय हुआ करता था. गणित और खगोल शास्त्र का यहां अभ्यास होता था. शोध होते थे. उन दिनों इरान में पारसी लोग थे. पारसी राजा थे. ये सारे ज्ञान के पूजक थे. हमारे देश में जब तक्षशिला पर हुणों के आक्रमण हो रहे थे, उन दिनों ईरान के राजा शापुरजी (प्रथम) ने यहां पर विश्वविद्यालय की स्थापना की थी.
किंतु इस जुंदिशापुर की एक और विशेषता हैं. इस विश्वविद्यालय पर भारतीय विद्वानों का प्रभाव था. यहां अनेक भारतीय आचार्य विद्यादान करते थे. तीसरी शताब्दी से इस्लामी आक्रमण होने तक, अर्थात सातवीं शताब्दी तक, यह विश्वविद्यालय फलता-फूलता रहा. छठवीं शताब्दी के पारसी राजा खोसरोव (प्रथम) ने इस विश्वविद्यालय को और सशक्त किया. अनेक नए पाठ्यक्रम प्रारंभ करने आचार्यों को प्रोत्साहित किया. आयुर्वेद, शरीरशास्त्र, खगोल शास्त्र, गणित आदि विषयों का यहा विस्तृत अभ्यास होता था. यह विश्वविद्यालय, संस्कृत के ग्रंथों को पहलवी और अरबी भाषाओं में अनुवाद करने का केंद्र था. अनेक आयुर्वेदिक ग्रंथों का मध्य पर्शियन (पहलवी) भाषा में अनुवाद किया गया. पंचतंत्र का अनुवाद, 'कलिला वा दिमना' इस नाम से, उन दिनों अत्यंत लोकप्रिय था. उन दिनों पारसी प्राध्यापक बोर्झुया, जो जीव विज्ञान / शरीर शास्त्र / आयुर्वेद का अध्यापन कर रहे थे, उन्होंने भारत का भ्रमण करके, अनेक भारतीय ग्रंथों का संग्रह किया था.
अल् बिरूनी (वर्ष 973 - वर्ष 1048) का तो अनेकों बार उल्लेख आता हैं. यह महमूद गजनी के साथ भारत आए. यहां की विद्वत्ता देखकर आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन किया. 'किताब-उल-हिंद' नाम की पुस्तक लिखी, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रशंसा की हैं. 'तारीख-अल-हिंद' (भारत का इतिहास) यह उनकी भारतीय संस्कृति पर लिखी पुस्तक हैं.
जुंदिशापुर के साथ एक और महत्व का इतिहास जुड़ा हैं
वराहमिहिर (वर्ष 505 - वर्ष 587) उज्जैन में खगोल शास्त्र और गणित के विद्वान के रूप में प्रस्थापित हो रहे थे. उन्ही दिनों पर्शिया (ईरान) के राजा खोसरोव - प्रथम (वर्ष 531 - वर्ष 579), जुंदिशापुर को नया और विस्तारित रूप देने का प्रयास कर रहे थे. वराहमिहिर की ख्याति सुनकर, खोसरोव (प्रथम) ने उन्हें जुंदिशापुर आमंत्रित किया. वराहमिहिर ने जुंदिशापुर में खगोलीय वेधशाला स्थापित की. वहां के अध्यापकों को खगोल शास्त्र और गणित के बारे में नई जानकारी दी.
बाद में भारत लौटकर, वराहमिहिर ने भिन्न-भिन्न देश की खगोलीय संकल्पनाओं पर आधारित 'पंच सिद्धांतिका' की रचना की. यह पांच सिद्धांत थे -
- सूर्य सिद्धांत - भारतीय
- वशिष्ठ सिद्धांत - भारतीय
- पितामह सिद्धांत - प्राचीन भारत
- पौलिसा सिद्धांत - ग्रीक (यूनानी)
- रोमिका सिद्धांत - रोमन
इसका अर्थ स्पष्ट हैं, हमारे पूर्वज, हमारे पुरखे, अन्य देशों की ज्ञान परंपरा का सम्मान करते थे. उनका अध्ययन करते थे. वह कभी भी कूपमंडूक नहीं रहे.
बाद में इटली के सिसिली और तोलेडो में इन अरबी ग्रंथों का लैटिन भाषा में अनुवाद किया गया. भारत का ज्ञान यूरोप पहुंचा, वो इस रास्ते से भी. छठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच अनेक भारतीय विद्वानों के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ. इनमें आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, सुश्रुत आदि प्रमुख थे. ब्रह्मगुप्त के 'सिद्धांत' का अरबी में अनुवाद 'सिंधिंद' (Sindhind) नाम से हुआ. सुश्रुत के पुस्तक को अरबी में 'किताब-ए-सुसरुद' कहां गया.
हारून-अल-रशीदी के अपील पर अनेक प्रतिभावान भारतीय छात्र बगदाद में आए. उनमें से अधिकतर, संस्कृत के विद्वान थे, जिन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया. 'मनका' जैसा प्रसिद्ध राजवैद्य भी पर्शिया आया था. उसने सुश्रुत, चरक समवेत अनेक विद्वानों के संस्कृत ग्रंथों को अरबी में प्रस्तुत किया.
ग्यारहवीं शताब्दी के अल-बरूनी (973 - 1048) की पुस्तक, 'किताब-अल-हिंद', भारतीयों के प्रशंसा से भरी पड़ी है वे लिखते हैं -
'The Hindus are very skilled in the science of numbers and calculations.' (हिंदू, गणित और गणना विज्ञान में अत्यधिक कुशल हैं). वे आगे लिखते हैं 'The Hindu possess a great deal of scientific knowledge, particularly in astronomy, mathematics and the calculation of eclipses.' (हिंदुओं के पास वैज्ञानिक ज्ञान का एक बड़ा भंडार हैं. विशेष रूप से खगोल विज्ञान, गणित और ग्रहणों की गणना का)
अनेक महत्वपूर्ण भारतीय ग्रंथों का पहेलवी और अरबी भाषा में अनुवाद हुआ. यह श्रृंखला, पर पर्शिया पर मुस्लिम अरबों के कब्जे के बाद भी, ग्यारहवीं / बारहवीं शताब्दी तक चलती रही. बाद में, जब भारत पर ही मुस्लिम आक्रांता शासन करने लगे, तो भारतीयों के प्रति सम्मान जाता रहा और पर्शिया ने भारत के विद्वानों को बुलाने की प्रथा / परंपरा समाप्त की.
प्रशांत पोळ, राष्ट्रीय चिन्तक, विचारक, लेखक- व्यवसाय से अभियंता (आईटी व टेलीकॉम), तकनीकी एवं प्रबंधन सलाहकार हैं.
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